रवि, यहां आओ।
जी एक मिनट सर। 'यार अखबार तो ठीक है ना आज का। पेपर पर सरसरी नजर डालते हुए मैं बॉस के पास पहुंच गया'।
जी सर, 'मैंने उनके पास जाकर बॉस से बुलाने का कारण पूछा'।
'क्या तुम अब संस्थान के साथ काम नहीं करना चाहते। अचानक क्या हुआ', बॉस ने मुझे देखते हुए पूछा।
बॉस के ये अल्फाज मुझे किसी विस्फोट से कम नहीं लगे। मैंने तो अभी संस्थान छोडऩे बारे सोचा भी नहीं। एकदम से बॉस ये क्या पूछ रहे हैं।
सर, 'मैं क्यों छोड़ूंगा नौकरी'।
'तुम्हारा ईमेल मिला है मुझे। इसमें लिखा है कि मैं संस्थान से इस्तीफा दे रहा हूं। आज से मेरी सेवाएं समाप्त समझी जाएं', बॉस ने बताया।
'सर, शायद आपको गलतफहमी हुई है। मैंने ऐसा कोई ईमेल नहीं किया आपको', मैंने आत्मविश्वास मगर थोड़ा डरते हुए अपनी बात कही।
तो ये क्या है।
बॉस ने अपना कम्प्यूटर दिखाते हुए कहा। ये ईमेल तुम्हारे ही आईडी से तो मिली है मुझे। तो फिर तुम कैसे कह सकते हो कि तुमने ईमेल नहीं किया।
'सर, जरूर किसी ने मजाक किया होगा या फिर मेरा ईमेल आईडी हैक कर ये ईमेल कर दिया हो आपको'। बॉस को मेरी बात पर शायद विश्वास हो गया और उन्होंने मुझे अपना काम करने के लिए भेज दिया।
बॉस के कैबिन से बाहर आते हुए झूठे ईमेल बारे सोच रहा था। आखिर कौन हो सकता है, जिसने यह ईमेल कर दिया।
क्या हुआ रवि, बॉस क्या कह रहे थे। मेरे सहकर्मी ने मुझसे पूछा।
'कुछ नहीं यार। किसी ने मेरे ईमेल आईडी से बॉस को मेरे नाम से इस्तीफा भेज दिया'।
क्या बात कर रहा है, फिर तो बॉस बिगड़ गए होंगे।
'हां, थोड़े से नाराज थे। मगर मेरी सफाई से संतुष्ट हो गए। मैं जरा ईमेल आईडी खोलकर देखता है। शायद वहां से कुछ क्ल्यू मिल जाए'।
मेरा सहकर्मी और दूसरे साथी हंसने लगे और बन गया बकरा चिल्लाने लगे।
तब समझा, इन लोगों ने मिलकर मुझे बकरा बनाया है।
पर ये सब कैसे किया, मैं समझ नहीं सका।
बाद में पता चला कि मेरे साथी ने एक वेबसाइट पर जेड टूल से मेरे ईमेल आईडी से बॉस को मेल कर दिया था। यहां से अगर आपके ईमेल से किसी को ईमेल कर दी जाए तो कोई साबित नहीं कर पाता कि आपने ईमेल नहीं किया।
मैं जरूर थोड़ी देरी के लिए घूम गया, मगर आप जरूर ध्यान रखना। अगर आपके आईडी से कोई किसी को ईमेल कर दे तो घबराएं मत। क्योंकि यह www.zindagi 365. की करामात या यूं कहें कि कारस्तानी हो सकती है। मैं आपको इसका लिंक भी दे रहा है। यहां से आप इस खतरनाक जेड टूल का प्रयोग कर अपने दोस्तों को बकरा बना सकते हैं। मगर ध्यान रखें, ऐसा मजाक मत करना, जो जिंदगी पर भी भारी पड़ जाए।
http://zindagi365.com/
http://zindagi365.com/zmail.aspx
Saturday, July 24, 2010
Sunday, July 4, 2010
...जान बचाओ प्यारो
चंटू को नया-नया इश्क हुआ। पर हाय री किस्मत! ये बुखार चढ़ा भी तो चौधरियों के ही अड्डे में। चौधरी तो चौधरी होते हैं भाई। कानून उनके लट्ठ के आगे पानी भरता है। फिर चंटू जैसों की हरियाणा में क्या बिसात। अगूंठा टेक चंटू ने ढाई आखर तो पढ़ लिए पर, प्रेम के बुखार का ताप छुपाने की तकनीक नहीं सीख पाया था। वैसे भी इश्क और मुश्क कहां छिपते हैं। एक दिन निकला था भैंसों को नहलाने दूसरे गांव में। भैंस पर बैठे-बैठे ही गांव की छोरी से चंटू की आंखें सात-आठ हो गईं। उधर भैंसे नहाने में मग्न हुई तो इधर चंटू मियां पीपल के पेड़ के नीचे इश्क के जोहड़ में गोते लगाने लग गए। पीपल के पेड़ पर तो वैसे भी भूतों का वास होता है। उसे क्या मालूम था कि पहेली फिल्म में शाहरुख खान तक भूत बनकर लटके थे। हालांकि पीपल के पेड़ पर भूत लटके थे या नहीं यह तो पता नहीं, लेकिन पेड़ के पीछे तो गांव के दो चौधरी पत्ते खेल रहे थे। चंटू के इश्क की फाइल गांव की गली से लेकर पंचायत तक पहुंच गई। 'भाईचारे के गांव में नैन लड़ाए और वो भी हमारे होते हुए। इश्क ही लड़ाना था तो किसी दूसरी स्टेट से छोरी खरीद लेता। माना कि इब छोरियों की कमी हो रही है। पर इसका मतबल ये नहीं चौधरियों की मूंछ काटने पर उतारू हो जाओ। दो दिन पहले ही दो को फांसी पर लटकाया था। क्या, भूल गया है चंटू। सूबा, डूंगा, फत्ता और दूसरे भाई आज तक कंवारे बैठे हैं। पर किसी की हिम्मत नहीं इश्क नाम की चिड़ी को दाना भी डाल दें। पंचायत को अपनी इज्जत बचानी होगी और एक बार फिर एक जोड़े का बोझ कम करना होगा'। पंचायत के चौधरी रुष्ट हो चुके थे। इसी बीच लट्ठ उठाए एक पंच ने मीडिया के टांग अड़ाने की बात कहते हुए सावधानी बरतने की सलाह दी। 'अखबार वाले तो नालायक होते हैं। इनकी चिंता करने की जरूरत नहीं है। सुबह जो छापते हैं शाम को उसी पर जलेबी बिकती है। खाकी वर्दी वाले तो म्हारे ही छोरे हैं और लीडर को पंचायत ही चुनती है। तो फिक्र नॉट और अपने मुस्टंडों को चंटू की फाइल सौंप दो। जिस भी जोहड़, पीपल के पेड़ या फिर किसी धर्मशाला में दिखाई दे, उसे पकड़कर हाजिर करो। उसकी पारो को भी साथ लेकर आना। नैन बेशक चंटू ने लड़ाए है पर इसमें कसूर उसके बाबू और मां का भी कम नहीं है। ऐसा बेअकल छोरा पैदा कर दिया और गांव की इज्जत पर कलंक लगा दिया। चंटू को तो यमपुरी भेजना ही है पर इसके बाबू और मां को भी गांव निकाला दे दो। आज के बाद कोई बाबू और मां भी छोरा-छोरी पैदा करन से पहले सोच लेंगे कि बच्चों को कुछ भी बनाएंगे पर प्यार मोहब्बत के पाठ से दूर ही रखेंगे'। चौधरियों ने फैसला सुना दिया। ...और इसके बाद चंटू और उसकी पारो का तो कुछ अता पता नहीं चला पर फैसला सुनाने वाला चौधरी देश की सबसे बड़ी पंचायत में जरूर पहुंच गया है। यहां अब वो हिंदू मैरिज एक्ट को ही बदलने के लिए लट्ठ गाड़ रहा है। ...तो नैनों के आसपास अब घोड़े की तरह पट्टियां लगा लें। कहीं ऐसा न हो कि अंखियां लड़ जाएं बीच बजार और झेलना पड़ जाए लाठियों का प्रहार और खुल जाएं स्वर्ग के द्वार। चंटू भी वहां पहुंच चुका है और संदेश दे रहा है, ये इश्क नहीं आसां पारो, चौधरियों से जान बचाओ प्यारो।
Tuesday, March 2, 2010
...मैं कमजोर नहीं हूं
दीदी, 'अब हमारी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाओ। आप भी अपने लिए जीवनसाथी तलाश लो'।
'...नहीं आरती। उम्र बीत गई है। अब तो सीधे परमधाम पहुंच जाऊं, उतना ही काफी है। तुम मेरी चिंता छोड़ो, और अपनी जिंदगी को संवारो'।
उम्र के चालीसवें पड़ाव पर पहुंची सुमन को जिंदगी ने हर कदम पर धोखा ही दिया। 18वें साल में आगे पढऩे की आरजू सीने में दफना शराब का ठेका चलाने वाले के साथ विवाह के बंधन में बंधना पड़ा। मां-बाप ने पैसा देखकर शादी कर दी, सोचा बड़ी की शादी ऊंचे घर में हो जाएगी तो छोटों का भी कुछ न कुछ जुगाड़ हो जाएगा। शादी के दो साल बाद शराबी पति ट्रक एक्सीडेंट में मारा गया और ससुराल वालों ने कुलच्छनी और बुरी नजर वाली कहकर घर से निकाल दिया।
सोचा, अब जीने में क्या रखा है। पर, मौत को गले लगाना भी कहां तक ठीक है। 'हां, सह लूंगी दुनिया के ताने। पर ईश्वर के अनमोल तोहफे जिंदगी को बिना उसकी अनुमति क्यों जाया करुं'।
मायके में ही कपड़े सिलाई कर दो छोटी बहनों को पढ़ाया। छोटे वाली आरती तो कम्प्यूटर भी चला लेती है। दिन-रात कपड़े सिलते-सिलते आंखें भी जवाब देने लगी। जिन आंखों पर काजल लगाए बिना स्कूल न जाती थी, आज उनके नीचे काले धब्बे पड़ गए थे। लाचारी में पहना चश्मा सुमन को बहनों की आंखों में नजर आते उनके सुनहरे दिनों के सामने कुछ न था।
'दीदी...दीदी...तुम्हारे लिए फोन है'। आरती की आवाज से जैसे होश में आई सुमन ने ये भी ना पूछा किसका फोन है।
हैलो, 'क्या आप सुमन जी बोल रही हैं'।
जी हां, 'मैं सुमन बोल रही हूं, आप कौन बोल रहे हैं'।
'मैं राजेंद्र सहगल बोल रहा हूं। मैंने आपका बायोडाटा शादी डाट काम पर देखा था। मुझे लगता है कि हमें एक बार मिलना चाहिए...'
'एक मिनट, मैं आपकी बात नहीं समझी। शायद आपको गलतफहमी हो गई है। आपने गलत नंबर डायल कर लिया है। आय एम सॉरी', सुमन ने यह कहकर फोन काट दिया।
'क्या हुआ दीदी, क्या कह रहे थे वो, फोन पर'।
'तो तू जानती है, किसका फोन था। तुझे शर्म नहीं आती, अपनी बड़ी बहन से इस तरह का मजाक करते हुए'। सुमन ने बिना कोई जवाब मांगे, आरती को बुरी तरह डांट दिया।
'दीदी, मुझे माफ कर दो। मैंने अनजाने में आपका दिल दुखा दिया। मैंने आपसे बिना पूछे आपकी फोटो और एक बायो डाटा शादी डॉट काम पर रजिस्टर्ड कर दिया था। अब हम बड़े हो गए हैं दीदी। अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं। आखिर कब तक हमारे लिए अपनी जिंदगी को सुई में धागे की तरह पिरोती रहोगी। क्या आपका जीवन एक खाली कपड़े से निकलकर सजा हुआ सूट नहीं बन सकता। जिस कपड़े में आप सुई लगाती है, उस सुई को जरा अपने जीवन में भी अब पिरो दो दीदी...। आपको मेरी कसम। एक बार राजेंद्र जी से मिल लो। अगर न पसंद आएं तो इनकार कर देना'।
आरती की बातों से सुमन की आंखें भरभरा गई और राजेंद्र को फोन कर मिलने की रजामंदी दे दी।
'आज मैं दीदी को खुद अपने हाथों से तैयार करूंगी'।
दूसरों के लिए कपड़े सिलते-सिलते सुमन खुद तो जैसे सजना ही भूल गई थी। जीवन में ऐसा भी मोड़ आएगा, उसने कभी नहीं सोचा था। पहली बार आरती और सुमन एकसाथ राजेंद्र से मिलने गई। फिर दो-तीन बार की मुलाकात में सुमन को भी राजेंद्र से प्रेम हो गया...और एक दिन राजेंद्र ने सुमन के सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया।
अचानक चंद मुलाकातों में बात यहां तक पहुंच जाएगी, उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था। जिंदगी कैसे करवट बदल रही थी। राजेंद्र उसे हर वो खुशी दे सकता था, जिसे शायद उसने ख्वाबों में भी सोचा था।
'नहीं...नहीं...ये सच नहीं हो सकता। मैं अपनी खुशियों में इतना कैसे डूब सकती हूं। अब तो अंधेरों से मैंने लडऩा सीख लिया था। क्या अब मुझे किसी सहारे की जरूरत है। क्या फिर मैं कमजोर हो जाऊंगी...। जब मुझे कमजोर समझकर दुनिया ने पीछे छोड़ दिया..अबला नारी समझकर तानों से मुझे आत्महत्या तक सोचने पर मजबूत कर दिया...छोटी बहनों को दुनिया से लडऩे की ताकत देने के लिए खुद को मजबूत किया...क्या आज मैं उनको छोड़ अपनी खुशियां तलाशने चल पड़ूं।
राजेंद्र, आज अगर मैं कमजोर पड़ी तो फिर शायद उठ नहीं पाऊंगी। ये दुनिया फिर नारी को कमजोर समझ आगे निकल जाएगी। पर मैं कमजोर नहीं हूं।
मुझे माफ कर देना...'
'...नहीं आरती। उम्र बीत गई है। अब तो सीधे परमधाम पहुंच जाऊं, उतना ही काफी है। तुम मेरी चिंता छोड़ो, और अपनी जिंदगी को संवारो'।
उम्र के चालीसवें पड़ाव पर पहुंची सुमन को जिंदगी ने हर कदम पर धोखा ही दिया। 18वें साल में आगे पढऩे की आरजू सीने में दफना शराब का ठेका चलाने वाले के साथ विवाह के बंधन में बंधना पड़ा। मां-बाप ने पैसा देखकर शादी कर दी, सोचा बड़ी की शादी ऊंचे घर में हो जाएगी तो छोटों का भी कुछ न कुछ जुगाड़ हो जाएगा। शादी के दो साल बाद शराबी पति ट्रक एक्सीडेंट में मारा गया और ससुराल वालों ने कुलच्छनी और बुरी नजर वाली कहकर घर से निकाल दिया।
सोचा, अब जीने में क्या रखा है। पर, मौत को गले लगाना भी कहां तक ठीक है। 'हां, सह लूंगी दुनिया के ताने। पर ईश्वर के अनमोल तोहफे जिंदगी को बिना उसकी अनुमति क्यों जाया करुं'।
मायके में ही कपड़े सिलाई कर दो छोटी बहनों को पढ़ाया। छोटे वाली आरती तो कम्प्यूटर भी चला लेती है। दिन-रात कपड़े सिलते-सिलते आंखें भी जवाब देने लगी। जिन आंखों पर काजल लगाए बिना स्कूल न जाती थी, आज उनके नीचे काले धब्बे पड़ गए थे। लाचारी में पहना चश्मा सुमन को बहनों की आंखों में नजर आते उनके सुनहरे दिनों के सामने कुछ न था।
'दीदी...दीदी...तुम्हारे लिए फोन है'। आरती की आवाज से जैसे होश में आई सुमन ने ये भी ना पूछा किसका फोन है।
हैलो, 'क्या आप सुमन जी बोल रही हैं'।
जी हां, 'मैं सुमन बोल रही हूं, आप कौन बोल रहे हैं'।
'मैं राजेंद्र सहगल बोल रहा हूं। मैंने आपका बायोडाटा शादी डाट काम पर देखा था। मुझे लगता है कि हमें एक बार मिलना चाहिए...'
'एक मिनट, मैं आपकी बात नहीं समझी। शायद आपको गलतफहमी हो गई है। आपने गलत नंबर डायल कर लिया है। आय एम सॉरी', सुमन ने यह कहकर फोन काट दिया।
'क्या हुआ दीदी, क्या कह रहे थे वो, फोन पर'।
'तो तू जानती है, किसका फोन था। तुझे शर्म नहीं आती, अपनी बड़ी बहन से इस तरह का मजाक करते हुए'। सुमन ने बिना कोई जवाब मांगे, आरती को बुरी तरह डांट दिया।
'दीदी, मुझे माफ कर दो। मैंने अनजाने में आपका दिल दुखा दिया। मैंने आपसे बिना पूछे आपकी फोटो और एक बायो डाटा शादी डॉट काम पर रजिस्टर्ड कर दिया था। अब हम बड़े हो गए हैं दीदी। अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं। आखिर कब तक हमारे लिए अपनी जिंदगी को सुई में धागे की तरह पिरोती रहोगी। क्या आपका जीवन एक खाली कपड़े से निकलकर सजा हुआ सूट नहीं बन सकता। जिस कपड़े में आप सुई लगाती है, उस सुई को जरा अपने जीवन में भी अब पिरो दो दीदी...। आपको मेरी कसम। एक बार राजेंद्र जी से मिल लो। अगर न पसंद आएं तो इनकार कर देना'।
आरती की बातों से सुमन की आंखें भरभरा गई और राजेंद्र को फोन कर मिलने की रजामंदी दे दी।
'आज मैं दीदी को खुद अपने हाथों से तैयार करूंगी'।
दूसरों के लिए कपड़े सिलते-सिलते सुमन खुद तो जैसे सजना ही भूल गई थी। जीवन में ऐसा भी मोड़ आएगा, उसने कभी नहीं सोचा था। पहली बार आरती और सुमन एकसाथ राजेंद्र से मिलने गई। फिर दो-तीन बार की मुलाकात में सुमन को भी राजेंद्र से प्रेम हो गया...और एक दिन राजेंद्र ने सुमन के सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया।
अचानक चंद मुलाकातों में बात यहां तक पहुंच जाएगी, उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था। जिंदगी कैसे करवट बदल रही थी। राजेंद्र उसे हर वो खुशी दे सकता था, जिसे शायद उसने ख्वाबों में भी सोचा था।
'नहीं...नहीं...ये सच नहीं हो सकता। मैं अपनी खुशियों में इतना कैसे डूब सकती हूं। अब तो अंधेरों से मैंने लडऩा सीख लिया था। क्या अब मुझे किसी सहारे की जरूरत है। क्या फिर मैं कमजोर हो जाऊंगी...। जब मुझे कमजोर समझकर दुनिया ने पीछे छोड़ दिया..अबला नारी समझकर तानों से मुझे आत्महत्या तक सोचने पर मजबूत कर दिया...छोटी बहनों को दुनिया से लडऩे की ताकत देने के लिए खुद को मजबूत किया...क्या आज मैं उनको छोड़ अपनी खुशियां तलाशने चल पड़ूं।
राजेंद्र, आज अगर मैं कमजोर पड़ी तो फिर शायद उठ नहीं पाऊंगी। ये दुनिया फिर नारी को कमजोर समझ आगे निकल जाएगी। पर मैं कमजोर नहीं हूं।
मुझे माफ कर देना...'
Thursday, February 25, 2010
हो हो....होली
होली, कहां हो तुम होली।
कहीं दिखाई क्यों नहीं देती। क्या तुम्हारा आईएसआई ने अपहरण तो नहीं कर लिया। ये मुए आईएसआई वाले भारत में हर फसाद की जड़ हैं। नहीं, नहीं आईएसआई तुम्हारा अपहरण कर क्या करेगी। वो तो पहले ही अलग-अलग रंग के सियार बने घूम रहे हैं। तुम तो प्रेम बांटने वाली हो, दुनिया को एक ही रंग में ढलने का संदेश देने वाली।
अब इतना भी मनुहार मत करवाओ। आओ, न। हम सब तुम्हारा एक साल से इंतजार कर रहे हैं। रोज हमें पीने को भले ही पानी न मिले, पर आज तो पानी की नदियां बहाकर ही दम लेंगे। कल्लू से बदला लेने के लिए तो मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं। बुरा न मानो होली का नारा लगाते हुए कल्लू की सारी हेकड़ी निकाल दूंगा। रोज चमचमाती हुई सिटी होंडा पर जब जबड़ा खोलता हुए निकलता हैं तो मेरे तन-बदन में आग लग जाती है।
तुम क्या जानो, हमने तुम्हारे स्वागत में क्या-क्या तैयारियां कर रखी हैं। पिछले महीने से कीचड़ और कूड़े का ठेका हमने ले लिया था... इतना ग्रीस भी इकट्ठा हो गया है पूरे शहर को रंग दें।
ठेके से याद आया, निगोड़ी काली नागनी- दारू भी देखो तुम्हारे आगमन पर सस्ती हो गई है। फरवरी-मार्च का महीना है। ठेके वाले दारू बेचने पर उतारू हैं, सस्ती मिली तो दस-बीस पेटियां खरीद ली है। कहीं तुम चीन में तो नहीं चली गई। नाटे कद और चपटी नाक वाले इन चीनियों ने हमारी नाक में दम कर रखा है। होली, दिवाली हो या फिर दशहरा। हमारे सारे जश्न तो इनके लाडले ही होते जा रहे हैं। बच्चों को चीनी पिचकारियों और रंगों के बिना मजा ही नहीं आता। हमारा तो धंधा ही चोपट हो गया है।
इतने गिड़गिड़ाने के बाद होली आखिर प्रकट हो ही गई। मगर ये क्या! तुम्हें क्या हो गया। तुम्हारा चेहरा तो दलाल स्ट्रीट से निकले उसे आदमी की तरह हो गया है जो घुसा था तब करोड़पति था और बाहर आया तो गंजपति हो गया। बेचारे के बाल तक नीलाम हो गए हो जैसे।
देखो तुम हर साल मुझे मत बुलाया करो। मैं वैसे ही तुमसे दुखी हूं। पहले तो दुश्मन को दोस्त बनाते थे। पर अब...तुम सारा साल जिस कल्लू की तारीफ करते नहीं थकते, मेरे आते ही उसे पीटने पर उतारू हो जाते हो। राह चलती लड़कियों को छेड़ते हो, और बदनाम मैं हो जाती हूं...। पानी तुम बहाते हो और नाम मेरा लगा देते हो।
ये तुम कैसी बहकी-बहकी बातें कर रही हों। ये 21वीं सदी है। डार्विन का सिद्धांत भूल गई। इंसान लगातार बदल रहा है। पहले हम बंदर से इंसान बने और अब इंसान से बंदर बन रहे हैं...इससे पहले कि तुम फिर एक साल के लिए भाग जाओ...आओ तुम्हें कीचड़ स्नान करवा देता हूं।
बुरा न मानो होली है!
वो होली
जब तुम लाती थी खुशियां ढेर
पराए भी हो जाते अपने
आज होली
रंग गुलाबी, पीला हो या नीला
झूठी मुस्कान और मन मैला
कहीं दिखाई क्यों नहीं देती। क्या तुम्हारा आईएसआई ने अपहरण तो नहीं कर लिया। ये मुए आईएसआई वाले भारत में हर फसाद की जड़ हैं। नहीं, नहीं आईएसआई तुम्हारा अपहरण कर क्या करेगी। वो तो पहले ही अलग-अलग रंग के सियार बने घूम रहे हैं। तुम तो प्रेम बांटने वाली हो, दुनिया को एक ही रंग में ढलने का संदेश देने वाली।
अब इतना भी मनुहार मत करवाओ। आओ, न। हम सब तुम्हारा एक साल से इंतजार कर रहे हैं। रोज हमें पीने को भले ही पानी न मिले, पर आज तो पानी की नदियां बहाकर ही दम लेंगे। कल्लू से बदला लेने के लिए तो मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं। बुरा न मानो होली का नारा लगाते हुए कल्लू की सारी हेकड़ी निकाल दूंगा। रोज चमचमाती हुई सिटी होंडा पर जब जबड़ा खोलता हुए निकलता हैं तो मेरे तन-बदन में आग लग जाती है।
तुम क्या जानो, हमने तुम्हारे स्वागत में क्या-क्या तैयारियां कर रखी हैं। पिछले महीने से कीचड़ और कूड़े का ठेका हमने ले लिया था... इतना ग्रीस भी इकट्ठा हो गया है पूरे शहर को रंग दें।
ठेके से याद आया, निगोड़ी काली नागनी- दारू भी देखो तुम्हारे आगमन पर सस्ती हो गई है। फरवरी-मार्च का महीना है। ठेके वाले दारू बेचने पर उतारू हैं, सस्ती मिली तो दस-बीस पेटियां खरीद ली है। कहीं तुम चीन में तो नहीं चली गई। नाटे कद और चपटी नाक वाले इन चीनियों ने हमारी नाक में दम कर रखा है। होली, दिवाली हो या फिर दशहरा। हमारे सारे जश्न तो इनके लाडले ही होते जा रहे हैं। बच्चों को चीनी पिचकारियों और रंगों के बिना मजा ही नहीं आता। हमारा तो धंधा ही चोपट हो गया है।
इतने गिड़गिड़ाने के बाद होली आखिर प्रकट हो ही गई। मगर ये क्या! तुम्हें क्या हो गया। तुम्हारा चेहरा तो दलाल स्ट्रीट से निकले उसे आदमी की तरह हो गया है जो घुसा था तब करोड़पति था और बाहर आया तो गंजपति हो गया। बेचारे के बाल तक नीलाम हो गए हो जैसे।
देखो तुम हर साल मुझे मत बुलाया करो। मैं वैसे ही तुमसे दुखी हूं। पहले तो दुश्मन को दोस्त बनाते थे। पर अब...तुम सारा साल जिस कल्लू की तारीफ करते नहीं थकते, मेरे आते ही उसे पीटने पर उतारू हो जाते हो। राह चलती लड़कियों को छेड़ते हो, और बदनाम मैं हो जाती हूं...। पानी तुम बहाते हो और नाम मेरा लगा देते हो।
ये तुम कैसी बहकी-बहकी बातें कर रही हों। ये 21वीं सदी है। डार्विन का सिद्धांत भूल गई। इंसान लगातार बदल रहा है। पहले हम बंदर से इंसान बने और अब इंसान से बंदर बन रहे हैं...इससे पहले कि तुम फिर एक साल के लिए भाग जाओ...आओ तुम्हें कीचड़ स्नान करवा देता हूं।
बुरा न मानो होली है!
वो होली
जब तुम लाती थी खुशियां ढेर
पराए भी हो जाते अपने
आज होली
रंग गुलाबी, पीला हो या नीला
झूठी मुस्कान और मन मैला
Wednesday, October 21, 2009
आओ स्वागत करें और कुछ सीखें
आसमान में उड़ते नन्हे परिंदों को कभी गौर से देखा है आपने. अपनी मर्जी के मालिक हवा में मदमस्त तैरने वाले पंछी जब चाहें और जहाँ चाहें उड़ निकलते हैं... और जहाँ मन करता है, वहीँ बैठ जाते हैं. इनको किसी मुल्क में जाने के लिए विज़ा की जरुरत नहीं...किसी पासपोर्ट के ये मोहताज नहीं. कोई इंटरव्यू नहीं और न ही किसी तरह का टेस्ट. कुदरत की ये खुबसूरत नियामत किसी सीमा से नहीं बंधी. ईश्वर ने इस धरती को स्वर्ग की तरह रचा. और हमने क्या रचा....सीमाएं...जिनकी कंटीली तारें कहीं खत्म होने का नाम नहीं ले रहीं. चाइना आज भारत के अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा करना चाहता है और पाक के कब्जे वाले कश्मीर में बांध बना रहा है...विभाजन के बाद से ही पाकिस्तान कश्मीर पर नजरें गड़ाये है. अमेरिका पूरे विश्व पर दादागिरी करना चाहता है. उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच ठनी हुई है. इजरायल और फिलिस्तीन में आये दिन ज़ंग हो रही है. हमारी आंकक्षाएं इतनी बढ गयी हैं की एक छोटा सा मुल्क मालदीव आज डूबने की कगार पर पहुँच गया है.
हमारे मुल्क में गुलाबी सर्दी के दस्तक देते ही दूसरे देशों के परिंदों का यहाँ आना शुरू हो गया है. इन्हें अठखेलिया करते देख लगता है मानों पूरब और पश्चिम की संस्कृतियाँ ओतप्रोत होकर इतना घुल गयीं हैं की अब जो ताना बंधा है वो कभी न टूटेगा...अलग अलग संस्कृतियों का सुन्दर मिलन तो हम हिन्दुस्तानियों की सभ्यता में है...तो फिर क्यों नहीं लेते हम इन मासूम परिंदों से सबक...क्यों नहीं बाँटते प्यार और खुशहाली का पैगाम. क्यों न इनके स्वागत में अपनी नदियों, तालों और घाटों को ही सुन्दर बना दें...इस बार जब ये पंछी अपने घर लौटें
तो धुल भरी गंगा, मैली यमुना और घाटों की स्मृतियाँ तो न लेकर लौटें...फिर हम ही तो कहते है...
अतिथि: देवो: भव:
कैद दिलों को खुला आसमा दिखाते परिंदें
कैसे उन्मुकत्ता और दूर फिकरप्रस्ती से
निश्छल प्रेम का एहसास कराते परिंदें
दूर देश से आये हैं आज वो
अब तो तेरा-मेरा छोड़ कुदरत के बन्दे
कब तक परीक्षा देंगे परिंदें
हमारे मुल्क में गुलाबी सर्दी के दस्तक देते ही दूसरे देशों के परिंदों का यहाँ आना शुरू हो गया है. इन्हें अठखेलिया करते देख लगता है मानों पूरब और पश्चिम की संस्कृतियाँ ओतप्रोत होकर इतना घुल गयीं हैं की अब जो ताना बंधा है वो कभी न टूटेगा...अलग अलग संस्कृतियों का सुन्दर मिलन तो हम हिन्दुस्तानियों की सभ्यता में है...तो फिर क्यों नहीं लेते हम इन मासूम परिंदों से सबक...क्यों नहीं बाँटते प्यार और खुशहाली का पैगाम. क्यों न इनके स्वागत में अपनी नदियों, तालों और घाटों को ही सुन्दर बना दें...इस बार जब ये पंछी अपने घर लौटें
तो धुल भरी गंगा, मैली यमुना और घाटों की स्मृतियाँ तो न लेकर लौटें...फिर हम ही तो कहते है...
अतिथि: देवो: भव:
कैद दिलों को खुला आसमा दिखाते परिंदें
कैसे उन्मुकत्ता और दूर फिकरप्रस्ती से
निश्छल प्रेम का एहसास कराते परिंदें
दूर देश से आये हैं आज वो
अब तो तेरा-मेरा छोड़ कुदरत के बन्दे
कब तक परीक्षा देंगे परिंदें
Tuesday, September 29, 2009
गुरु दा बाग़
वैसे तो मैं सभी धर्मो को ईश्वर के खुबसूरत रंग ही मानता हूँ मगर सिखिज्म से जाने कैसी आत्मीयता जुडी है. शायद ये दुनिया की सबसे बड़ी एंजियो भी है, जो बिना किसी सहायता के समाज के लिए बहुत कुछ करती है. खैर ये तो मेरा निजी मामला है...मगर मैं आज कुछ ख़ास शेएर करना चाहता हूँ...मैं अहिंसा पर कुछ सर्च कर रहा था, उसी दौरान मुझे कुछ पढ़ने को मिला, जिसे यहाँ लिखने में खुद को रोक नहीं सका...
देश की आजादी में अपना योगदान देने वाले सभी सिख एक लड़ाई और भी लड़ रहे थे. गुरद्वारो की रक्षा और सुधार के लिए भी एक जंग चल रही थी. उस समय गुरूद्वारे महंतो के कब्जे में थे. गुरुद्वारों का प्रबंध अपने हाथो में लेने के लिए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी स्थापित की गयी. कही कही के महंतो ने कमेटी की बात मान ली और प्रबंध सौंप दिया. ब्रिटिश सरकार भी इस बात पर विचार करने लगी की ये काम कानूनन किया जाये और कानून बनाकर प्रबंध कमेटियों को दे दिया जाये. वहीँ अकालियों से नाराज होकर महंत जोर जबरदस्ती करने लगे थे. एक गुरूद्वारे में तो महंत ने बहुत अकालियों को बेहद करुरता से मरवा दिया था. इस तरह की एक घटना ननकाना साहब गुरूद्वारे में भी हो गयी थी. इससे अकाली भी क्रोध में आ गए. इस समस्या का हल निकालने के लिए अमृतसर में अकालियों ने गाँधी जी का सुझाया अहिंसा मंत्र अपना लिया. हालाँकि अहिंसा नीति सिखों के लिए नयी नहीं थी, मुस्लिम काल में भी सिखों ने इस निति को ग्रहण किया था और बहुत दुःख सहे थे.
अमृतसर से कुछ दूर है गुरु दा बाग़. यहाँ एक गुरुद्वारा है, जो महंत के कब्जे में था. अकालियों ने इसे अपने हाथो में ले लिया. अकालियों और महंत में तय हुआ की गुरुद्वारा अकालियों के हाथ में रहे और मठ महंत के कब्जे में. वहां कुछ जमीन थी, जिस पर बबूल का जंगल था. आगे चलकर आपस में फिर विवाद हो गया. शिरोमणि कमेटी की और से गुरूद्वारे का प्रबंध हो रहा था. ग्रन्थ साहब की सेवा के लिए सेवक थे. गुरुद्वारों में अक्सर लंगर लगता है. यहाँ भी लंगर लगाया जाता था. लंगर बनाने के लिए बबूल के पेड़ काट लिए जाते. महंत ने इस पर रोक लगायी और पुलिस बुला ली. सरकार की ओर से अकालियों को जंगल में जाने से रोक दिया गया. अकालियों ने सत्याग्रह करने की ठान ली. वे जंगल में पेड़ काटने जाते, पुलिस रोकती; न रुकने पर पहले तो गिरफ्तार कर लेती पर बाद में मारपीट कर भगाया जाने लगा. जो अकाली वहा जाता, उसे बुरी तरह पीटा जाता. सरकार ने भी वहा जाने के रास्ते पर कुछ दुरी से ही रोक लगा दी. अकालियों में बहुत जोश था. वे अमृतसर के अकाल तख्त में जाते, अहिंसा की सोगंध खाते और जंगल की और निकल जाते. जब रास्ता खुला होता, गुरूद्वारे में आकर रुकते. वहा से जंगल में जाते और पिटे जाते. जब रास्ता रोक दिया गया तो उनके जथे रस्ते में रोके और पीटे जाते. इतनी बुरी तरह मारते की वो बेहोश तक हो जाते. इसका शोर सारे देश में फ़ैल गया. दूर दूर से लोग वहा का सत्याग्रह देखने आते. कांग्रेस की बड़ी कमेटी भी वहां पहुंची. कमेटी ने देखा, तगडे सिख हाथ जोड़ कर आगे जाते, दूसरी तरफ से लोहे और पीतल से बनी लाठिया लिए पुलिस के सिपाही अकालियों को बुरी तरह मारने लगे. तब तक मारा जब तक सब बेहोश नहीं हो गए. यहाँ तक की केश तक पकड़ कर घसीटा गया. लोग यह देखने के लिए जमा होते, एक भी आदमी पुलिस पर हाथ नहीं उठाता था. अहिंसा का जवलंत उदहारण पूरे देश के सामने आया. हजारो लोग गिरफ्तार हुए. अकालियों की हिम्मत और शक्ति जबरदस्त थी. जो शक्ति मजबूत जवान बिना हाथ उठाये दिखा सके, उसे कोई भी शक्ति दबा नहीं सकती. सरकार की और से कोई रास्ता नहीं निकला. आखिर में सर गंगाराम ने महंत से जमीन लेकर अकालियों को दे दी. सत्याग्रह की उपयोगिता और इसमें निहित सम्भावना साबित हो गयी. इसका श्रेय सिखों को है. उन्होंने इसे अपनी सत्य निष्ठा और शक्ति से दिखला दिया..
(देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद जी की आत्मकथा से साभार)
देश की आजादी में अपना योगदान देने वाले सभी सिख एक लड़ाई और भी लड़ रहे थे. गुरद्वारो की रक्षा और सुधार के लिए भी एक जंग चल रही थी. उस समय गुरूद्वारे महंतो के कब्जे में थे. गुरुद्वारों का प्रबंध अपने हाथो में लेने के लिए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी स्थापित की गयी. कही कही के महंतो ने कमेटी की बात मान ली और प्रबंध सौंप दिया. ब्रिटिश सरकार भी इस बात पर विचार करने लगी की ये काम कानूनन किया जाये और कानून बनाकर प्रबंध कमेटियों को दे दिया जाये. वहीँ अकालियों से नाराज होकर महंत जोर जबरदस्ती करने लगे थे. एक गुरूद्वारे में तो महंत ने बहुत अकालियों को बेहद करुरता से मरवा दिया था. इस तरह की एक घटना ननकाना साहब गुरूद्वारे में भी हो गयी थी. इससे अकाली भी क्रोध में आ गए. इस समस्या का हल निकालने के लिए अमृतसर में अकालियों ने गाँधी जी का सुझाया अहिंसा मंत्र अपना लिया. हालाँकि अहिंसा नीति सिखों के लिए नयी नहीं थी, मुस्लिम काल में भी सिखों ने इस निति को ग्रहण किया था और बहुत दुःख सहे थे.
अमृतसर से कुछ दूर है गुरु दा बाग़. यहाँ एक गुरुद्वारा है, जो महंत के कब्जे में था. अकालियों ने इसे अपने हाथो में ले लिया. अकालियों और महंत में तय हुआ की गुरुद्वारा अकालियों के हाथ में रहे और मठ महंत के कब्जे में. वहां कुछ जमीन थी, जिस पर बबूल का जंगल था. आगे चलकर आपस में फिर विवाद हो गया. शिरोमणि कमेटी की और से गुरूद्वारे का प्रबंध हो रहा था. ग्रन्थ साहब की सेवा के लिए सेवक थे. गुरुद्वारों में अक्सर लंगर लगता है. यहाँ भी लंगर लगाया जाता था. लंगर बनाने के लिए बबूल के पेड़ काट लिए जाते. महंत ने इस पर रोक लगायी और पुलिस बुला ली. सरकार की ओर से अकालियों को जंगल में जाने से रोक दिया गया. अकालियों ने सत्याग्रह करने की ठान ली. वे जंगल में पेड़ काटने जाते, पुलिस रोकती; न रुकने पर पहले तो गिरफ्तार कर लेती पर बाद में मारपीट कर भगाया जाने लगा. जो अकाली वहा जाता, उसे बुरी तरह पीटा जाता. सरकार ने भी वहा जाने के रास्ते पर कुछ दुरी से ही रोक लगा दी. अकालियों में बहुत जोश था. वे अमृतसर के अकाल तख्त में जाते, अहिंसा की सोगंध खाते और जंगल की और निकल जाते. जब रास्ता खुला होता, गुरूद्वारे में आकर रुकते. वहा से जंगल में जाते और पिटे जाते. जब रास्ता रोक दिया गया तो उनके जथे रस्ते में रोके और पीटे जाते. इतनी बुरी तरह मारते की वो बेहोश तक हो जाते. इसका शोर सारे देश में फ़ैल गया. दूर दूर से लोग वहा का सत्याग्रह देखने आते. कांग्रेस की बड़ी कमेटी भी वहां पहुंची. कमेटी ने देखा, तगडे सिख हाथ जोड़ कर आगे जाते, दूसरी तरफ से लोहे और पीतल से बनी लाठिया लिए पुलिस के सिपाही अकालियों को बुरी तरह मारने लगे. तब तक मारा जब तक सब बेहोश नहीं हो गए. यहाँ तक की केश तक पकड़ कर घसीटा गया. लोग यह देखने के लिए जमा होते, एक भी आदमी पुलिस पर हाथ नहीं उठाता था. अहिंसा का जवलंत उदहारण पूरे देश के सामने आया. हजारो लोग गिरफ्तार हुए. अकालियों की हिम्मत और शक्ति जबरदस्त थी. जो शक्ति मजबूत जवान बिना हाथ उठाये दिखा सके, उसे कोई भी शक्ति दबा नहीं सकती. सरकार की और से कोई रास्ता नहीं निकला. आखिर में सर गंगाराम ने महंत से जमीन लेकर अकालियों को दे दी. सत्याग्रह की उपयोगिता और इसमें निहित सम्भावना साबित हो गयी. इसका श्रेय सिखों को है. उन्होंने इसे अपनी सत्य निष्ठा और शक्ति से दिखला दिया..
(देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद जी की आत्मकथा से साभार)
Monday, August 3, 2009
Enough is enough
Enough is enough brother.
Last night, Rakhi Got marry with her dreamy rich boy and I was wailing. I advised you to sold the land but you dint hear me. I just wanted to travel to USA. Once I get the NRI license, who knows Rakhi would get marry with me. But you murdered my conspiracy.
Ve Buttey kyo veer naal ladai karda pya hei ( Butta, why are you fighting with your elder brother). Bapu ji (Father), you have put my name Butta and everybody is looking me as am I miracle. My (Butta) niece Kuku was playing with his friends last day. Sharma ji came to him and you know what he told to him? “Kuku, you are not good player. You should learn from your uncle. Everbody wanted his resign but he put his Boot (shoes) on the chair as like Angad’, sharma ji says. Bapu ji, Kuku asked me, “where is my shoes and who is Angad. Please don`t make my mind like curd”.
Enough is enough.
Today I was watching new release movie Love Aajkal. What a climax. I remembered my love story. I was beau of raajvanti (Rajo), but she got marry with rich guy shamsher. If Meera (Deepika) can break with her husband and got marry again with Saif, I should also try boss (I talked with myself). You know what happened, Where I sitted at multiplex, Rajo was also watching that movie with her husband. I shocked to see and felicitate to her. Her husband and two kids asked to her about me. She said, ‘this is Butta, my mango brother. Her husband ordered to his kids ‘Herraiy-Shairaiy, he is your Mamaji, say Namaste to him…..Is this Love Aajkal?
Enough is enough.
Last night, Rakhi Got marry with her dreamy rich boy and I was wailing. I advised you to sold the land but you dint hear me. I just wanted to travel to USA. Once I get the NRI license, who knows Rakhi would get marry with me. But you murdered my conspiracy.
Ve Buttey kyo veer naal ladai karda pya hei ( Butta, why are you fighting with your elder brother). Bapu ji (Father), you have put my name Butta and everybody is looking me as am I miracle. My (Butta) niece Kuku was playing with his friends last day. Sharma ji came to him and you know what he told to him? “Kuku, you are not good player. You should learn from your uncle. Everbody wanted his resign but he put his Boot (shoes) on the chair as like Angad’, sharma ji says. Bapu ji, Kuku asked me, “where is my shoes and who is Angad. Please don`t make my mind like curd”.
Enough is enough.
Today I was watching new release movie Love Aajkal. What a climax. I remembered my love story. I was beau of raajvanti (Rajo), but she got marry with rich guy shamsher. If Meera (Deepika) can break with her husband and got marry again with Saif, I should also try boss (I talked with myself). You know what happened, Where I sitted at multiplex, Rajo was also watching that movie with her husband. I shocked to see and felicitate to her. Her husband and two kids asked to her about me. She said, ‘this is Butta, my mango brother. Her husband ordered to his kids ‘Herraiy-Shairaiy, he is your Mamaji, say Namaste to him…..Is this Love Aajkal?
Enough is enough.
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