Wednesday, April 13, 2011

मनबो

जनवरी की 22 तारीख के बाद अपनी दुकान (ब्लॉग) पर राशन पहुंचाने आया हूं।
डायलॉग तो आपको पता ही होगा, काम ना करने के सौ बहाने।
आपने ये चुटकुला भी सुना ही होगा,
संता और बंता सो रहे थे। चोर आए और चादर चुराकर ले गए।
संता उठा तो उसने बंता को कहा, चोर को पकड़ते हैं।
बंता ने कहा, छोड़ यार। जब वो सिराना लेने आएगा तो पकड़ लेंगे।
इसके बाद दोनों सो गए।
संता और बंता की तरह मेरा भी यही हाल है।
मैं भी सोचता हूं कि लिखने-लिखाने के झंझट में क्या पड़ूं।
कोई आए और मेरे ही नाम से लिखकर चला जाए।
इस बार तो सच्ची में ही ऐसा हो गया।
आज की दुकान का राशन-पानी मुझे दिया है मेरी लिटिल सिस्टर पिंकी ने।
यूं कि सारा दिन चपड़-चपड़ करने वाली सिस्टर को कॉलेज की मैग्जीन में एक स्टोरी देनी थी।
मेरा कॉलर नजर आया तो पकड़कर खींच दिया। कॉलर के पीछे मेरी नाजुक सी गर्दन भी थी।
आप रात को तीन बजे सोए होंगे और कोई अगर सुबह-सुबह सात बजे इस तरह उठा दे तो गुस्सा कितना आएगा। और वो भी इस बात के लिए कॉलेज में स्टोरी देनी है। उसका टॉपिक डिस्कस करना है।
जी तो कर रहा था कि उसकी चोटी काट दूं, पर अंदर ही अंदर थोड़ा खुश भी था कि चलो, आज दिन में सुबह का मूवी शो देख लूंगा।
भई अपुन को तो सुबह का ही शो सूट करता है। सस्ता भी पड़ता है और भीड़भाड़ कम होती है।
पिंकी कम्प्यूटर पढ़ाती है। तो मैंने कहा, तू क्यों न आईटी या फिर मशीनी दुनिया पर कुछ लिख मार।
हमने इसी तरह कुछ देर तक टॉपिक के बारे सोचा और फाइनली एक कहानी का प्लॉट तैयार हो गया।
मगर शर्त यह रखी कि कहानी वो ही लिखेगी। मैं इसमें कुछ हेल्प नहीं करने वाला हूं।
जैसे ही उसने यस कहा, मेरी तो मुराद पूरी हो गई। मैं चादर तानकर फिर एक घंटे के लिए सोने चला गया। थोड़ा आराम करने के बाद ही फिल्म देखने जाना था ना।
इसके अगले ही दिन उसने कहानी मेरे सामने लाकर रख दी।
मैंने पढ़ी तो पसंद आई। सोचा, क्यों न आप सबके साथ भी शेयर कर लूं। असल में इस कहानी को शेयर करने के पीछे एक खास मकसद भी है। इसके बारे में दो मिनट बाद बताता हूं।
..........
रोहन आज बहुत खुश है। उसे कलाई पर राखी बांधने के लिए बहन जो मिल गई है। पर ये खुशी कितनी सच्ची है, यह तो उसका दिल ही जानता था।
बचपन में जब सारे दोस्त राखी का धागा कलाई पर बांधकर आते थे, तब वो कितना निराश हो जाता था।
मां से बार-बार पूछता, मेरी बहन क्यों नहीं है। सबकी बहन हैं।
मुझे भी एक बहन चाहिए। मां, चाहकर भी कोई जवाब नहीं दे पाती।
उस दिन खिलौनों की दुकान पर मशीनी गुडिय़ा देखकर रोहन के चंचल मन ने खुद से वादा कर लिया था, वो बड़ा होकर अपने लिए खुद एक बहन बनाएगा। वो इंजीनियर बनेगा और रोबोट बनाएगा।
उसने रोबो बहन का नाम भी सोच लिया था।
मशीनी रोबो को वह मनबो बुलाएगा।
उसके मन की हर बात सुनेगी वो। वो कहेगा तो उठेगी, वो कहेगा तो बैठेगी।
क्यों मम्मा। कैसा रहेगा यह नाम।
तू तो पागल हो गया है। ऐसे कोई मशीनी बहन थोड़ा बनती है, मां उसकी बातों को बचपना कहकर टाल देती थी।
पर मां को क्या पता था। बचपन में जो जिद पकड़ी थी, वही उसकी जिंदगी बन जाएगी।
इंजीनियरिंग में एडमिशन ही इसलिए लिया था, ताकि वो अपनी मन की मुराद पूरी कर सके। दिन-रात बस मशीनों और कम्प्यूटर में आंखें गड़ाए रहता था। पूरे दस साल और आठ महीने लगे उसे एक मशीनी रोबो को इंसानी रूप देने में। उस दिन उसने एक कामयाबी हासिल कर ली थी।
उसके सपनों ने अब उड़ान भरनी शुरू कर दी थी। मंजिल अब ज्यादा दूर नहीं थी।
सांझ में झूके हुए बादलों को जब वो देखता, तब लगता मानों वो भी उसे आशीर्वाद देने के लिए ही नीचे आ रहे हैं।
पर वक्त कहां मिलता उसे इन बादलों से बात करने के लिए।
वो तो खोया रहता बस उन लम्हों के इंतजार में, कब मनबो उसकी कलाई पर सच में राखी बांधेगी। बचपन में देखी मशीनी गुडिय़ां साकार रूप लेने लगी थी।
उसके इशारों पर दाएं-बाएं चलती थी। रिमोट से बटन दबाता तो मुस्कुराती और इशारा करता तो बैठ जाती।
बस, वो अपने मन से कुछ नहीं करती थी।
जैसी वो बचपन में चाहता था, ठीक वैसे ही तो बन रही थी वो।
उसकी हर बात मानने वाली मनबो।
उसकी कल्पना उसी के मुताबिक साकार ले रही थी। पर फिर भी उसे एक बात मन में अकसर कचोटती रहती।
उसके दोस्तों की बहनों को किसी काम के लिए रिमोट के इशारे की जरूरत नहीं थी। राखी बांधने के लिए किसी भाई को अपनी बहन को आदेश नहीं देना होता था। सब बहनें बाजार से खुद राखी खरीदती और थाली सजाकर प्यार से भाई की कलाई को प्रेम से सजाती।
कल ही तो था रक्षा बंधन।
उस शाम को मां उसके ऑफिस में खाना देने आई थी। उस शाम ही क्यों। ऐसे कितनी हीं शामें थी, जब मां रोहन के लिए टिफिन लेकर उसे खाना खिलाने आ जाती थी।
उसे कहां सुध रहती थी खाने की।
पर उस शाम को रोहन की आंखों की नमी मां से छुपी नहीं।
मां ने जब प्यार से सहलाया तो गोद में सिर रखकर फूट-फूटकर रोने लग गया था वो।
मां। कल फिर रक्षा बंधन है।
पर देखो ना। ये मनबो मुझसे कोई बात ही नहीं करती।
क्या नहीं सिखाया मैंने इसे। हर उस बात का ध्यान रखती है, जो मैं इसके सिस्टम में डालता हूं। पर ये क्यों नहीं जानती थी, कल इसके लिए सबसे खास दिन है। क्यों ये भी दूसरों की तरह मार्केट नहीं जा सकती। क्या ये कभी मेरे के लिए राखी नहीं खरीदेगी। क्या मैं इसे कहूंगा, तभी मेरी कलाई का सूनापन दूर करेगी।
क्यों मां।
ऐसी मशीन क्यों नहीं बन सकती, जो मेरे दिल की बात सुने। मेरे रिमोट के इशारों की नहीं।
मैं सब दोस्तों को जब बताता हूं कि मैंने अपने के लिए खुद बहन बनाई है, तब अपने चेहरे पर खुशी के भाव दिखाने के लिए अंदर से कितने आंसू निकलते हैं, ये मैं ही जानता हूं।
रोहन, जब हमने गाडिय़ां बनाई तब पैरों की कीमत भूल गए। जब हमने हथियार बनाए तब इंसान की कीमत भूल गए। जब हमने कम्प्यूटर बनाए तब अपनों को भूल गए। मशीनें इंसान के लिए होती है, इंसान मशीनों के लिए नहीं।
वो एक मशीन ही तो थी, जिसने तेरी बहन को दुनिया में आने ही नहीं दिया।
बचपन में मां, क्यों उस सवाल को टाल जाती थी, आज उसका जवाब मां के आंसू दे रहे थे।
अपने बेटे की सूनी कलाई को हाथ में पकड़े मां ने उसके सारे जवाब दे दिए।
मनबो, उन दोनों के पास ही खड़ी थी। हर बात से अनजान।
सिर्फ एक आदेश के इंतजार में शायद। रोहन के रिमोट दबाने के...।

अगर पढ़ें तो जरूर बताएं कैसी लगी कहानी। बिगड़ते लिंगानुपात पर सही तो कहा है। क्या मालूम, हमें आगे चलकर इंसानों की जगह मशीनों से ही काम चलाना पड़े। पर क्या वो इंसान बन पाएंगी।

खैर, बात आगे बढ़ाता हूं। कहानी यहां शेयर करने का मकसद। पिछली पोस्ट में मैंने जिक्र किया था कि कहानी कैसे-कैसे मोढ़ लेती है और कैसे उसकी शुरुआत होती है। इस सब पर हमने पुणे में एक 45 मिनट के लेक्चर में जाना।
ये तो कहानीकार ही अच्छे से बता सकता है कि, वो कैसे-कैसे इतना अच्छा लिख जाते हैं।
अब रश्मि दी का ही ब्लॉग (http://mankapakhi.blogspot.com/2011/04/blog-post.html) देख लो । पता नहीं कैसे लिख जाती हैं इतना अच्छा।
हमारे टीचर संजीव जी ने एक शानदार डेमो दिया।
उन्होंने एक लड़की से कहानी शुरू की। सबसे पहली सीट पर बैठे साथी को कहा, कहानी को एक लाइन में आगे बढ़ाओ।
साथी ने कहा लड़की गूंगी और बहरी है।
इसके बाद दूसरे साथी ने एक लाइन में कहानी को आगे बढ़ाया, लड़की अस्पताल जाती है।
तीसरे ने भी एक लाइन में बताया, अस्पताल बंद है।
इस तरह वो कहानी हम सबके पास से गुजरते हुए एक सुखद अंत तक पहुंचती है।
इस डेमो के पीछे उनका कहना था कि कहानीकार ऐसे ही कहानी नहीं लिख देता। कितने ही पड़ावों से वो गुजरता है। मनबो लिखने से पहले पिंकी ने भी ढेर सारा डिस्कस किया और जमकर मेरा खून पिया (नींद आ रही है अब तक, कमजोर भी लग रहा हूं)।
ओके-ओके-ओके-ओके
लेक्चर लंबा हो रहा है।
तीन महीने बाद आया हूं तो दुकान को पूरी भरकर ही जाऊंगा। अब अगला मौका पता नहीं कब मिलेगा।
टाठां।

Saturday, January 22, 2011

इस तड़प का भी अपना मजा है

जब हम बच्चे थे (वो तो अब भी हैं, कद बढ़ गया बस) तब सोचा करते थे कि यार इन फिल्मवालों के मजे हैं। सारी दुनिया घूमते हैं, ऐश करते हैं। बचपन से फिल्मी खबरें पढऩे का बढ़ा शौक रहा है।
पापा जी ने पूछा, इंदिरा गांधी के कितने बेटे हैं।
इसका जवाब तो उस समय नहीं पता होता था मगर धर्मेंद्र के कितने बच्चे हैं, यह जरूर पता होता था।
पापा जी अखबार की ही दुनिया में हैं। अखबारों के एजेंट हैं, सो हमें दुनियाभर के अखबार पढऩे को मिल जाते। फिल्मों की खबरें पढऩे का इतना चस्का था कि संडे को हम दो-दो सप्लीमेंट मंगाते थे। उस समय केवल संडे को ही चार पेजों का फिल्मी अखबार मिलता था। मैं और मेरी बहन, दोनों यही पन्ना पढऩे का इंतजार करते थे। इसलिए उस दिन झगड़ा न हो, पिताजी दो सप्लीमेंट भेज देते। कहानियां, गॉसिप और फिल्में देख-देखकर जी करता एक नाटक खेला जाए।
और एक दिन मौका मिल गया।
मैंने, अपनी बहन और बहन की सहेली के साथ डाकुओं का एक नाटक खेलना शुरू कर दिया। नाटक पंजाबी में था, और डाकू को लड़की को उठाकर ले जाना था।
जाहिर है, मैं डाकू बना था।
मुझे रौब जमाने में बड़ा मजा आता था।
मैंने रोबिले अंदाज में कहा,
ओ कुडि़ए।
ऐ शीशे उत्ते जदों तक नचेंगी, ओदों तक ही बचेंगी।
इससे पहले कि नाटक गति पकड़ता, मम्मी ने मेरी आवाज सुन ली और उनके हाथों ने गति पकड़ ली। मेरी जो धुनाई हुई, आज तक याद है। अब जब भी मैं फिल्मों की बात करता हूं तो मजाक में घरवाले कह देते हैं, क्यों भूल गया हे, बचपन दी पिटाई।
वैसे फिल्म बनाना तो दूर कैमरा तक आज तक तरीके से ऑपरेट नहीं कर सका हूं। मगर एक तड़प है, जिसका अपना ही मजा है। यही तड़प पूणा तक भी ले गई। पूणा की यादों की दूसरी किस्त का मकसद असल में इसी चुलबुलाहट का जिक्र करना है।
छोटे कद के संजीव दीक्षित। डॉक्यूमेंट्री और मेलोड्रामा का पाठ पढ़ाने में माहिर। इनसे पहले किसी ने भी यह नहीं पूछा कि क्या आप भी फिल्म बनाना चाहते हैं या फिर इस लाइन में ही कुछ तीर, मोला या फिर चाकू-छुरी मारना चाहते हैं।
माय फ्रेंड्स। मैं जानता हूं कि आप सबके दिल में कुछ न कुछ करने की चाहत है, जो यहां तक खींच लाई है। पर क्या कभी आपने इस चाहत की तरफ शिद्दत से एक कदम भी बढ़ाया है। चलो, मैं आज आपको कुछ नहीं पढ़ाऊंगा। क्या आप मुझे एक कहानी, एक नाटक या कुछ भी लघु कथा सुना सकते हैं। उनके इस अप्रत्याशित सवाल पर सभी चुप।
वो समझ गए। और कहा, मैं अगली क्लास में आपसे आपकी कहानी सुनुंगा। आप कुछ भी सुना दें। देश के अलग-अलक कोनों से आप आए हैं। पूणा में भी बहुत कुछ देखा होगा। जो भी आपको अच्छा लगे, वो सुना दें। मगर शर्त यह होगी कि उसे डायरी पर लिखें। क्योंकि बिना डायरी पर लिखी आपकी कल्पनाएं केवल कल्पनाएं ही रह जाएंगी। एक सच जान लीजिए, यह कभी साकार नहीं होती, जब तक कि इन कल्पनाओं को कागज पर उकेरेंगे नहीं।
इसके बाद उन्होंने डॉक्यूमेंट्री और मेलोड्रामा के बारे में कुछ टिप्स दिए और इन पर थोड़ा बहुत बताया।
क्लास खत्म हुई और मेरे दिमाग में छटपटाहट शुरू हो गई।
कौन सी कहानी सुनाऊंगा।
कहीं सबके सामने इज्जत पुरानी दही में पानी मिलकर खट्टी लस्सी जैसी न हो जाए। सबको दिखाने के लिए चेहरे पर कोई तनाव नहीं था, मगर अंदर ही अंदर तो धक-धक हो रही थी। इतना डर तो मम्मी की पिटाई का भी नहीं था।
खैर, रात को हॉस्टल पहुंचे और मैंने फटाफट अपनी डायरी खोल ली। कल्पनाओं को पन्ने पर जो लाना था। ऊटपटांग कहानियां तो पहले भी लिखता रहता हूं, पर डर के कारण किसी को पढ़ाता नहीं हूं। उस रात को अपने मित्र पंकुल जी और योगेश जी के साथ पूणा को केंद्र में रखकर एक स्टोरी सुनाई। कहानी बेहद बंडल थी, मगर उन्होंने आलोचना नहीं की।
अगले दिन सुबह पहली क्लास ही संजीव दीक्षित जी की थी। उन्होंने कल की बात दोहराई और सबसे पूछा, क्या किसी ने कहानी लिखी। अगर लिखी है तो सामने आकर सुनाए। किसी ने कोई जवाब नहीं दिया।
मैंने सोचा, अच्छा है यार। जान बची। पर सच ये नहीं था। मैं चाहता था कि कोई कहानी सुनाए तो कम से कम मुझमें भी हिम्मत आए।
कोई नहीं उठा, कहानी सुनाने के लिए।
इस बार संजीव जी ने जोर देकर कहा, यार सुनाओ। अच्छा। जो भी दिल से कहानी सुनाना चाहता है, वो सुना दें। यकीन मानिए, आपका विश्वास ही बढ़ेगा।
मैंने हिम्मत जुटाई और पहुंच गया अपनी डायरी लेकर।
गुड। संजीव जी ने हिम्मत बढ़ाते हुए कहा। आप मेरी चेयर पर बैठ जाओ और समझो कि मैं प्रोड्यूसर हूं। डरो मत। बस। पिटाई नहीं करूंगा।
सभी मेरी ओर हैरानी से देख रहे थे। मेरी हिम्मत बढऩे की एक वजह थी हिंदी भाषा। संजीव जी हिंदी भाषा में ही हमसे बात कर रहे थे। इससे पहले ज्यादातर सभी टीचर्स ने इंग्लिश में ही बात की और इंग्लिश में सभी ने जवाब दिया। इंग्लिश तो मेरी छोटी बुआ जैसी है, जिससे मेरी कभी नहीं बनी।
मेरी कहानी के बाद दूसरे दो साथियों ने भी डायरी में लिखा हुआ पढ़कर सुनाया। अपनी कहानी जरा बाद में बताता हूं, क्योंकि बोरिंग है और फिर आगे लिखने की हिम्मत नहीं रह जाएगी।

अनुजा ने बेहद भावुक कहानी सुनाई। दिल्ली मेट्रो का एक सच।

दिल्ली वालों की मेट्रो में तकलीफ को उन्होंने बेहद भावुकता से प्रस्तुत किया। मेट्रो में इतनी भीड़ होती है कि आम यात्रियों को बैठने की सीट तो दूर खड़ा होना भी मुश्किल हो जाता है। इसके बाद स्टेशन पर उतरने का एक युद्ध। मेट्रो के दरवाजे फटाफट खुलते और बंद होते हैं। भीड़ इतनी होती है कि ट्रेन पर चढऩे वाले किसी को बाहर तक नहीं निकलने देते। सभी को अंदर जाने की जल्दी होती है। पर वो अंदर से बाहर जाने वालों की तकलीफ नहीं समझते।
कहानी एक युवक की है, जो इंटरव्यू के लिए जा रहा है। समय पर नहीं पहुंचा तो नौकरी नहीं मिलेगी। उसे राजीव चौक पर उतरना है। भीड़ इतनी है कि धक्कामुक्की में उसकी क्रीज की हुई शर्ट बुरी तरह से खराब हो जाती है। बेहद मुश्किल से उसने बैग पकड़ा हुआ है। इधर-उधर हिलने पर यात्रियों का गुस्सा उसे झेलना पड़ता है। जिस नौकरी के लिए वह जा रहा है, वह उसके लिए बेहद जरूरी है। राजीव चौक पर जैसे ही मेट्रो रूकती है, वह चाहकर भी नीचे नहीं उतर पाता। और दरवाजा बंद हो जाता है और मेट्रो आगे चल पड़ती है।
दिल्ली के आधुनिक दिल मेट्रो ने उसे इंटरव्यू में फेल कर दिया।
संजीव जी ने यह कहानी सुनकर मुंबई की लोकल ट्रेनों का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि वैसे तो सीट मिलती नहीं। अगर सीट पर कब्जा जमाना हो तो वो चढ़ते ही बैग को सीट की तरफ उछाल देते हैं। मतलब रिस्क लेना पड़ता है। कई जगहों पर तो लोकल ट्रेनों में दबंग लोग चढऩे तक नहीं देते। अगर चढ़ गए तो जबरन उतरने नहीं देते। क्योंकि उन लोगों को कार्ड खेलने में परेशानी होती है।
दूसरी कहानी छत्तीसगढ़ से आए एक साथी की थी। उसने कविता के माध्यम से हिला दिया।
उन्होंने नक्सलवाद पर कुछ शब्द सुनाए। उन्होंने बताया कि नक्सली के हाथों में हथियार हैं और वो शांति की बात कर रहे हैं। सेना के हाथ में भी हथियार हैं, और वो भी शांति की बात कर रहे हैं।
बंदे ने क्या बात कही थी। लूट लिया उसने तो। जरा उसकी बात नक्सली और सरकार सुन ले और इसका अर्थ भी समझ जाए तो शायद फसाद ही खत्म हो जाए।

मेरी कहानी का नाम था टिकट की कीमत

यह
कहानी एक ऐसे बंदे से शुरू होती है, जो मुंबई से जम्मू तक के लिए टिकट रिजर्व करवाता है। वह बेहद गरीब और बेरोजगार है। ट्रेन के त्यौहारी सीजन के आने से कुछ माह पहले ही वो सीट बुक करवा लेता है और निकल पड़ता है यात्रियों की तलाश में। जी हां। यही उसके और परिवार की रोजी-रोटी का जरिया है। ट्रेन में खड़े रहने वाले यात्रियों को वह अपनी सीट मुहैया करवाता है और खुद खड़ा होकर हजारों किलोमीटर लंबा सफर तय करता है। पर उस दिन पूणा में एक खास घटना घटित होती है। विधानसभा चुनाव के परिणाम आ गए हैं और सरकार बनाने के लिए पार्टी को एक आजाद उम्मीदवार का समर्थन हासिल करना है। अगर वो समर्थन नहीं देगा तो सरकार नहीं बनेगी। वो आजाद उम्मीदवार अपनी सीट का करोड़ों में सौदा करता है और सरकार बनवा देता है। उस विधायक को पुलिस सुरक्षा में स्टेशन से ट्रेन में ले जाया जा रहा था। सैकड़ों जवान और नेता उसे पलकों पर बैठाए भगवान जी की पालकी की तरह उठाए ले जा रहे थे। ठीक उसी स्टेशन पर ट्रेन में अपनी सीट बेचने वाला पकड़ा जाता है। टिकट चेकर और पुलिसकर्मी उसे हाथों में रस्सी बांधकर गिरफ्तार कर ले जा रहे हैं। स्टेशन पर सीट बेचने वाले विधायक और उस गरीब पर कैमरा एक जगह फोकस करता है।
यही मैं कहानी खत्म कर देता हूं।
सवाल यह था कि जिस सरकार ने करोड़ों रुपए देकर विधायक खरीदे, क्या वो हमें ईमानदार राज दे सकेगी। विधायक ने करोड़ों रुपए में अपना ईमान बेचा तो उसे इतना मान-सम्मान और उस बेचारे ने खड़ा रहना मंजूर होकर कुछ रुपए लेकर अपने परिवार को पालने के लिए जोखिम उठाया तो उसे क्या मिला। जेल।

मैंने पिछली रात को पंकुल जी और योगेश जी को जो कहानी सुनाई थी, वो कहानी क्लास में नहीं सुनाई। चार किशोर युवाओं पर आधारित पांच मिनट की कहानी से मैं डर गया था। पर इस कहानी को मैंने लिखा है और उसे कभी फुरसत के पलों में ब्लॉग पर भी डाल दूंगा।
पर उसी रात को मैंने यह स्टेशन की कहानी भी बना ली थी, जिसे सुबह डरते-डरते सुना दिया। मुझे तो खुशी मिली कहानी सुनाने में, हालांकि बेहद खराब थी। कंपलीट नहीं थी। हां, तारीफ जरूर की सभी ने। इसके लिए एक बार फिर सभी का तहे दिल से थैंक्स।
इन कहानियों के दौर के बाद संजीव जी ने 'कहानी कैसे-कैसे मोढ़ लेती है और कैसे झट से बदल जाती है। कहां से कहां पहुंच जाती है।' इसका बेहद मजेदार फंडा बताया। इस पर बाद में गौर फरमाएंगे।
कहानियों के बारे में ज्यादा अच्छे से पढऩा है तो रश्मि दी का ब्लॉग पढ़ें। http://mankapakhi.blogspot.com/
मेरा एक मित्र है, उसे भी बड़ी ललक लगी रहती है सिनेमा और कहानियों की। मैंने जब उसे यह बात बताई तो उसने कागज पर लिखना तो नहीं मगर ब्लॉग जरूर बना दिया। अब वह आजकल कविताएं लिखने में मगन है।
तो जी अगर आपको भी यह बीमारी है तो कम्प्यूटर की हार्डडिस्क या फिर डायरी में चुग्गा-पानी डालते रहे और कीबोर्ड/पेन बजाते रहें। कसम से मजा बहुत आएगा।
कम से कम टेंशन तो बनी ही रहेगी। अच्छी या खराब। क्या करें और क्या न करें।
देरी से पोस्ट डालने की आदत से बहुत डांट खा चुका हूं। पर क्या करूं, मजबूर हूं। आलसी जो हूं।
हां, आखिर में एक बात।
मेरे कुछ मित्रों को यह टॉपिक पसंद नहीं है। उनसे मैं माफी चाहता हूं। इन संस्मरण से फ्री होते ही कुछ अन्य चीजें लिख पाऊंगा।
ओके
टाठां।

Sunday, December 12, 2010

दस का पहला दम


हेडिंग से समझ गए होंगे कि दस से कुछ न कुछ लिंक तो होगा। ठीक समझ रहे हैं आप। खैर, इसकी चर्चा जरा बाद में करते हैं।
सबसे पहले आपको लेकर चलते हैं पुणे नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया के कांफ्रेंस कम प्रीमियर बॉक्स में। यहां फिल्मों के शो भी होते हैं और क्लास भी लगती है।
पहली मुलाकात हुई एनएफएआई के पूर्व निदेशक और रिटायर्ड प्रो. सुरेश छाबडिय़ा सर से। फिल्मों को बेहद बारीकी से पढऩे वाले छाबडिय़ा सर से मिलने से पूर्व आप सोच नहीं सकते कि फिल्मों से कोई इतना प्रेम भी कर सकता है। पर हां, एक बात का ख्याल रखिएगा, उनके सामने सिंह इज किंग जैसी मसाला फिल्म की चर्चा न करें तो ठीक रहेगा। वो भले ही बुलंद आवाज में नहीं कहते, मगर मैं उनकी भावनाओं को दुष्यंत जी के इन शब्दों में बुदबुदा रहा था,

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

क्या है फिल्म। क्या सोचते हैं आप?
मेरे लिए बेहद आसान जवाब था, मनोरंजन का जरिया (अच्छा हुआ बोला नहीं)
मेरे मेरठ के मित्र पंकुल शर्मा ने जब डेविड धवन की चर्चा की तो वो एकदम से हैरान हो गए।
मुझे लगा, लो बेटा- खुशवंत सिंह जी को पार्टी में बुलाकर ओनली वेज खिलाने और पानी पिलाने वाली बात कर दी (एक दिन खुशवंत जी को किसी ने पार्टी में बुलाया और चिकन-वाइन सर्व नहीं की। उसके बाद उन्होंने उनकी पार्टी में जाना बंद कर दिया, ऐसा उन्होंने अपने एक लेख में बताया था। अब आप समझ सकते हैं कि मैं सोच रहा था कि बात बिगड़ी और क्लास की छुट्टी)
पर अल्लाह की मेहरबानी!
उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, प्लीस आस्क दिस क्वाशच्न टू अनदर टीचर।
उनका मंतव्य सभी समझ चुके थे, इसलिए अब चुप रहे।
डायरेक्टर ने क्या थीम लेकर फिल्म बनाई है, एक तिनका भी अगर हिलता है तो क्यों हिलता है। बंदे ने चालीस-पचास करोड़ रुपए लगा दिए और हमने मल्टीप्लैक्स में पॉपकार्न और पेप्सी गले में उतारी, डकार लेकर रिजल्ट बता दिया, फिल्म बढिय़ा है या घटिया (यहां फिल्म समीक्षकों की वाट लगा रहे हैं), छाबडिय़ा जी से कुछ इस स्टाइल में रूबरू हुए हम।
लुक एट द लैपर्ड (पर्दे पर फिल्म दिखाई... करीब पांच मिनट तक हवाएं चल रही है और साथ ही कुछ आड़ी-तिरछी प्रतिमाएं नजर आ रही हैं। इसी सीन में राजपरिवार का तनाव भी दिखाया जा रहा है)
तो क्या देखा आपने, छाबडिय़ा जी का सवाल था यह हम सबके लिए।
लिसन, ये तो लगा ही होगा कि कुछ न कुछ तनाव है। डायरेक्टर ने कितनी चतुराई से हवाओं का प्रयोग किया है। ये हवाएं भी तनाव का अहसास करवाते हुए हमें छू रही हैं। फिर ये प्रतिमाओं की तस्वीरें। कितनी बेढंगी हैं। यह भी कह रही है कुछ न कुछ गड़बड़ है। राजपरिवार के बीच जो दिख रहा है, वह भी बता रहा है कुछ तो दिक्कत है।
क्या आपने फील किया यह सब।
ओए- यार ये क्या था। अच्छा हुआ, सर ने मुझसे नहीं पूछा कि चलो बताओ तुमने क्या फील किया इस सीन के बारे में। मेरे सिर में दर्द हो चुका था ये सीन देखकर। जब उन्होंने इसे एक्सप्लेन किया तो मुंह खुला का खुला रह गया।
अगला सीन उन्होंने दिखाया, बॉम्बे फिल्म का।
(तू ही रे...गीत में मनीषा कोइराला घर से प्रेमी को मिलने के लिए दौड़ी चली आ रही है। प्रेमी समुद्र तट पर उसका इंतजार कर रहा है। तेज हवाएं चल रही हैं और उसका पल्लू भी एक जगह प्रतिमा में फंस जाता है। बारिश की बूंदे और एक-एक चीज बेहद खूबसूरती से पिरोई गई थी, ऐसा मैंने पहली बार वॉच किया)
सीन खत्म होते ही, फिर छाबडिय़ा सर ने पूछा-क्या देखा।
इस बार मैंने कहा- हाए कम्बख्त जालिम हवाएं। इतनी भी क्या बेरुखी पल्लू तक पकड़ लिया (अब सोचता हूं, क्या बकवास बोल दिया)
छाबडिय़ा सर से हमने जापान, ईरान और अन्य मुल्कों में बनने वाली क्लासिक फिल्मों के बारे में जाना। कई बार तो मन बोर हो जाता, मगर अब लगता है कि वाकैयी में वो सही है।
हम आम जीवन की तरह ड्रेसिंग रूम देखकर बंदे के प्रति नजरिया बना लेते हैं। घर के अंदर जाएंगे ही नहीं तो असलियत कैसे पता चलेगी। यह बात फिल्म पर भी लागू होती है। फिल्म की आत्मा को समझना भी जरूरी है। ये मैंने जाना इस वर्कशॉप से और खासकर रश्मि दीदी का ब्लॉग पढ़कर।
रिलेक्स फ्रेंड्स। आई नो, आप बोर हो रहे हैं। अगली बार आपको समर नखाटे सर से मिलवाऊंगा।
नखाटे सर दिखने में जितने नाटे हैं, उतने ही खतरनाक भी हैं। पहली क्लास में उनका पहला डॉयलॉग

मेरे कर्ण अर्जुन आएंगे, मेरे कर्ण अर्जुन आएंगे
एक मिनट- ये हो क्या रहा है।

उनके साथ बिताए करीब पांच घंटे बेहद रोमांचक और मस्तीभरे रहे।

जाते-जाते छाबडिय़ा सर के लिए एक बार फिर दुष्यंत जी के शब्द गुनगुना रहा हूं...

उस नई कविता पे मरती नहीं हैं लड़कियां

इसलिए इस अखाड़े में नित गजल गाता हूं मैं!

...और हां, वर्कशॉप में शामिल मित्रों में सबसे ज्यादा प्रभावित किया मुझे अनुजा, जलपति, मारुफ और पंकुल ने। इनकी भी बात होगी, मगर अगली बार।
रूको यार, हेडिंग का मतलब तो समझ लो। अगर वहीं बता दिया होता तो शायद आप आगे ही निकल जाते। दस दिन की वर्कशॉप थी, तो दस पोस्ट तक पकाने वाला हूं । अगली बार सच्ची में सच्ची, मसालेदार क्लास के बारे में चर्चा करूंगा।
ओके टाठां (टाटा की तो वाट लगेली है ना)

Saturday, October 30, 2010

बाबा मुझे माफ करो

मेरी यह पोस्ट शायद कुछ लोगों को नाराज कर सकती है। हो सकता है कि कुछ लानते-मलानतें भी भेजें। पर मैं खुद को रोक नहीं सका हूं। सोचा तो यह था कि पुणे से लौटते ही अच्छे-अच्छे संस्मरण लिखूंगा और ढेर सारी बातें शेयर करूंगा। पर वापस लौटते समय लिए गए एक निर्णय से काफी दुखी हूं।
बात 24 अक्टूबर की है। इसी दिन रात को मनमाड़ से दिल्ली तक मेरी ट्रेन थी। सोचा दिनभर खाली क्या करेंगे। शनि सिंगणापुर और शिरडी में घूम आते हैं (दर्शनों की बात तो बाद में ही सोचते हैं)। पिछले 14 दिनों की थकान को साइड में रखकर भारी बैग उठाए मैं अपने मेरठ के एक मित्र के साथ चलने को तैयार हो गया। बस और ऑटो से धक्के खाते हुए सबसे पहले शनिदेव के द्वारे पहुंचे। समझिए की शनिदेव की कृपा शुरू हो गई। ऑटो वाले ने शनिदेव मंदिर से दूर एक मैदान में छोड़ दिया। यहां हमारी तरह हजारों लोग आए हुए थे। हमें देखते ही एक दुकानदार दौड़ा आया और हमारा सामान अपनी दुकान में रखवा दिया। हम तो चाहते ही यही थे कि कहीं सामान रखने की जगह मिल जाए। फिर जाएंगे दर्शन करने। पर सामान रखवाने की कीमत मुझे चार सौ रुपए देकर चुकानी पड़ी। बदले में क्या मिला, दो-चार फोटो और दो सौ ग्राम सरसो का तेल। बंदे ने बताया कि ये तेल शनिदेव को चढ़ाना है। इससे वो खुश होते हैं।
मैंने पूछा दादा (यहां रहते-रहते हर किसी को दादा कहने की आदत हो गई), हम तो अपने शहर में तेल नहीं लेकर जाते। अगर लें भी जाएं तो एक कटोरी चढ़ा देते हैं। हम इतना तेल ले जाकर क्या करेंगे।
उसने हैरान होते हुए कहा, ये देखिए बाऊजी। लोग पांच-पांच लीटर तेल लेकर जा रहे हैं और आप दो सौ ग्राम तेल चढ़ाने में हिचक रहे हैं।
मैंने ज्यादा बहस नहीं की और स्नान करके रीति अनुसार धोती पहनकर चल दिया शनिदेव के द्वारे।
लंबी लाइन। चलते-चलते पैर थक गए। फर्श पर तेल ही तेल था। बुरी तरह टूट चुका था। वो तो अच्छा हुआ गिरा नहीं। सोच रहा था, पानीपत से क्या मैं यह तेल चढ़ाने यहां आया हूं। क्या कर रहा हूं मैं...।
आखिर में शनिशीला के नजदीक पहुंच ही गया। हजारों हजार लोग तेल चढ़ाने में जुटे हुए थे। हम सुबह ग्यारह बजे पहुंच गए थे वहां। सुबह से इतनी भीड़ थी तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि दिनभर में लाखों लीटर सरसों का तेल चढ़ जाता होगा। जिस देश में चालीस करोड़ जनता बीस रुपए रोजाना से कम पर गुजारा करती है, उस देश के देवता लाखों लीटर तेल पीकर संतुष्ट होते हैं।
मेरा मूड खराब हो चुका था और मैंने आधे मन से शीला पर थोड़ा तेल चढ़ाया और पैकेट वहीं रखकर आगे निकल आया।
जाते-जाते तय कर लिया, दोबारा कम से कम तेल चढ़ाने तो नहीं आऊंगा।
बाहर आकर उसी दुकान पर कपड़े बदले और निकल चले शिरडी। सवारियों से भरी निजी गाड़ी में हम भी फेवीकोल की तरह चिपक कर बैठ गए। गाड़ी वाले ने बताया, एक घंटे तक पहुंच जाएंगे शिरडी। मगर हाय री किस्मत। थोड़ी दूर चलते ही दिखाई दिया कि आरटीओ का छापा था। गाड़ी वाले ने तुरंत स्टेयरिंग घुमाया और पहिए कच्चे रास्ते पर दौडऩे लगे। गाड़ी उछलती-कूदती कच्चे रास्ते पर दौड़ती हुई तीन घंटे बाद हमें शिरडी तक आखिर ले ही गई।
बीच में मन ही मन डॉयलॉग मार चुका था, उम्मीदों का चिराग जलाए रखना...। कभी तो रात होगी।
खैर, शाम से पूर्व हम शिरडी पहुंच गए। यहां उतरते ही सिंगणापुर की तरह एक बंदा आया और हमारा सामान रखवाने की बात करने लगा। मगर इस बार हमने सामान दुकान पर नहीं बल्कि क्लॉक रूम में रखवाया। सात रुपए का टिकट कटवाया। वो बंदा हमें अपनी दुकान पर ले गया। यहां पर भी डेढ़ सौ रुपए की पर्ची कटवाई और प्रसाद का थैला लेकर हम चल दिए दर्शन करने।
जाहिर है तन टूट चुका था और मन भी आधा फूट चुका था। फिर भी अपने मित्र के साथ कदमताल करते हुए चलते रहे। मेरा मित्र काफी धार्मिक ह्रदय का बंदा है। शनि मंदिर में भी जय शनिदेव जय शनिदेव करते आंखें मूंदे हुए चलता रहा। यहां भी साईं भक्ति में कंपलीट डूबा हुआ था। मैं भी ईश्वर को मानता हूं, पर आवाज पता नहीं कहां गायब हो जाती है।
थोड़ी आगे पहुंचे ही थे कि अंदर जाने का रास्ता दिखाई दिया। इससे पहले कि अंदर जाते, सिक्योरिटी गार्ड ने रोक लिया।
भाई कहां जा रहे हो। यहां वीआईपी पास मिलते हैं। अगर आपको पास लेकर दर्शन करना है तो जाओ, नहीं तो आगे से दर्शन करो।
मैं चौक उठा। दादा ये क्या माजरा है।
भाई साहब, सौ रुपए देकर पास मिलता है। पास लोगे तो पंद्रह मिनट में नंबर आ जाएगा और नहीं लोगे तो डेढ़ घंटे में नंबर आएगा।
रोम-रोम तो कह रहा था कि सौ रुपए दो और दर्शन करके चलते बनो।
पर अगले ही पल यह ख्याल मन से निकल गया। शनि मंदिर से जो खट्टा अनुभव लेकर चला था, यहां भी दिल और टूट गया।
सौ रुपए देकर साई बाबा के दर्शन। क्यों? जिसके पास सौ रुपए नहीं है वो बेचारा लाइन में लगा रहे। तड़पता रहे दर्शनों को। वाह रे साई बाबा। यहां भी अमीरों की सुनवाई।
मन तो किया यहीं से वापस लौट जाऊं। पर नहीं कर सका। वही हुआ जो सिक्योरिटी गार्ड ने बताया था। बिना पास के लाइनों में लगे हुए भक्तों का नंबर डेढ़ घंटे में आया जबकि पास लेकर आए भक्त हमारे सामने से विशेष गेट खुलवाकर दर्शन करके चलते बने।
मन ही मन गीत गाने लगा...

जरा मुल्क के रहबराओं को बुलाओ

ये कूचें ये गलियां ये मंजर दिखाओ

जिन्हें नाज है हिंद पर उनको लाओ

जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं?

कहां हैं, कहां हैं, कहां हैं?

मेरे साथ ही कुछ बुजुर्ग भी चल रहे थे। मन में ख्याल आया कि अगर वीआईपी पास बनाना ही है तो इन बुजुर्गों का फ्री क्यों नहीं बनाते। ये भी किया जा सकता है जो बच्चे अपने माता-पिता को लेकर आएं, उनका पास फ्री बनाया जाएगा। कम से कम पास के ही बहाने बच्चे अपने माता-पिता को लेकर तो आ सकते हैं।
मरते-मरते किसी तरह दर्शन किए और बाहर निकले। मैं आगे चल रहा था अपने मित्र से बात करते हुए। बात करते-करते मैं तो आगे बढ़ गया, जब पीछे मुढ़कर देखा तो मित्र था ही नहीं। पीछे गया तो मित्र महोदय एक मंदिर में साष्टांग प्रणाम किए हुए लेटे हुए थे। मैं बाहर ही बैठ गया और मन ही मन प्रार्थना की कि मुझ दुष्ट का तो जो होगा सो होगा, पर मेरे मित्र को साई बाबा जरूर कामयाबी देना।
जाते-जाते यहां भी तय किया, दोबारा नहीं आऊंगा। कम से कम जब तक ये सौ रुपए के वीआईपी पास दर्शन खत्म नहीं होते।
ह्रदय इतना टूट चुका था कि तय किया कि घर जाकर प्रसाद भी नहीं बांटूंगा। क्यों बांटू प्रसाद। इसका मेरे अंतर्मन ने कोई जवाब नहीं दिया।
आप निराश मत होइए और मेरे शब्दों से कोई धारणा भी मत बनाइएगा। अगली पोस्ट में अच्छी-अच्छी बातें बताऊंगा। मैं 10 अक्टूबर से 23 अक्टूबर तक पुणे रहा। यहां एनएफएआई और एफटीआई की तरफ से सीने कोरसपोंडेट कोर्स का आयोजन किया गया था। अगली पोस्ट में इनका जिक्र करूंगा।

Wednesday, October 6, 2010

एक मौत और छुट्टी...।

शादीशुदा परिवार पर हास्यविनोद से भरे लेख को कंपलीट कर मैं ब्लॉग पर डालने की तैयारी कर रहा था। तभी मेरी सिस्टर ने स्कूटी का हॉर्न दिया। उसके जल्दी आने पर चौक गया और गेट खोलकर कॉलेज से जल्दी आने का कारण पूछा।
कॉलेज के टीचर के युवा बेटे की अक्समात मौत होने पर शोकस्वरूप छुट्टी कर दी गई।
फिर तो सारे टीचर संस्कार में गए होंगे। तू क्यों नहीं गई। कितने बजे होगी अंत्येष्टि। चल फिर अब साथ ही चल पड़ेंगे, मैंने उससे पूछा।
कोई फायदा नहीं है। वहां कोई नहीं जा रहा। कॉलेज में छुट्टी हो गई, तो सारे घर या इधर-उधर चले गए। फिर मैं वहां क्या करती। जब हम रजिस्टर पर साइन करने जा रहे थे, उसी समय सारे टीचर्स बाहर खड़े थे।
एक टीचर कह रहे थे, रात को ठीक से सो नहीं सका। फिल्म देखने चले गए थे। चलो अच्छा ही हुआ छुट्टी मिल गई। थकावट दूर हो जाएगी। इतने में दूसरे ने कहा, कॉलेज में स्टूडेंट पढ़ते तो हैं नहीं। फिर हम क्यों सिरदर्द बढ़ाएं। छुट्टी हो ही गई है। चलो इसी बहाने मैकडी पर बर्गर खाने चलते हैं।
कॉलेज में सबको पता था, टीचर के बेटे की मौत हो गई है। पर एक मैडम अपनी सगाई की खुशी में मिठाई का डिब्बा लिए घूम रही थी। साथ ही चहक रही थी, क्योंकि इस छुट्टी से उसे अपने होने वाले जीवनसाथी के साथ घूमने का मौका जो मिल गया था। कुछ ने अवसर का 'लाभ' उठाया और मॉल में फिल्म देखने निकल गए। एक क्लर्क बोला, रजिस्टर पर लिखते-लिखते थक गया हूं। जरा सा आराम नहीं मिलता। ओए, छोटू चाय लेकर आ जरा। चाय पीकर घर चलते हैं।
ये तो किसी की मौत पर सेलिब्रेशन मना रहे हैं।
उसका एक-एक शब्द मुझे अंदर तक झकझोर गया। ये सब मैं यहां इसलिए बता रहा हूं क्योंकि ये किसी अशिक्षित या ऐरे-गैरी जगह की बात नहीं है। शिक्षा के मंदिर में जब किसी की मौत को छुट्टी का नाम देकर जश्न मनाया जाएगा, तब उस समाज की संवेदनाएं कैसी होंगी, ये बताने की जरूरत नहीं है। ...और कुछ लिखने की हिम्मत भी नहीं हो रही अब।
कमलेश्वर जी ने जब 'दिल्ली की एक मौत' कहानी लिखी थी, उस समय तक शायद हृदय के किसी कोने में भावनाएं जीवित थी, मगर आज तो वो भी मर चुकी हैं। क्योंकि आज कोई किसी के आखिरी सफर में भी साथ नहीं देता। क्योंकि एक मौत हमारे लिए छुट्टी जो लेकर आती है।

बड़े कमाल का है ये दौर
दूसरों के आंसूओं में
ढूंढते हैं अपनी खुशियां
दुख देकर चैन तो पहले भी हमने लूटा
अब झूठी बूंदे तक नहीं बहती
ये तरक्की, कोरापन है या कुछ और

बड़े कमाल का है ये दौर।

Friday, September 24, 2010

भाप्पा-भाप्पा कहंदे सी किने,. खुश रहंदे सी

कॉमनवेल्थ, अयोध्या अध्याय और बाढ़ के बीच पता नहीं क्यों इन दिनों हर जगह मुझे मिया-बीबी के किस्से बहुत पढऩे को मिल रहे हैं। इतने दिनों से ब्लॉग नहीं लिखा। सोचा छूटे पंछी (बैचलर ) की तरह इधर उधर के ब्लॉग पर ही विचरण कर लूं। तो यहां भी रश्मि जी और वंदना जी के लेख पढऩे को मिल गए, जो पारिवारिक रिश्तों और उलझनों पर विचार सांझा कर रहे थे। मनोरंजक चैनल वाले हर जगह जोडिय़ां बनाने और जोडिय़ा तोडऩे पर तुले हुए हैं। हमारे घर पर भी बस यही चर्चा छिड़ी रहती है (समझिए कि रोज बचते फिरते हैं या बचने का नाटक करते हैं) । एक दिन मेरी सिस्टर ने बेगम और शौहर के बीच का फर्क पूछ लिया। जवाब मिला, बेगम वो जिसे कोई गम न हो और शौहर वो, जिसकी विवाह के बाद शौ हर ली गई हो। ...चलो जाने दो, बात लंबी क्यों बढ़ाएं। हमने सोचा क्यों न आपको आपको एक छोटी सी फैमिली से मिलवा दें। मैंने अपनी कलम और डायरी उठाई और पहुंच गए अपने मित्र के घर शादी शुदा जीवन के अनुभव जानने...।

इस फैमिली में दो भाई हैं, दोनों शादीशुदा। दोनों के दो-दो बच्चे। खुदा की रहमत से दोनों के पास एक-एक लड़का और एक-एक लड़की है। बच्चों की उम्र पांच साल से ऊपर नहीं हैं। यानी कुर्बान हुए अभी छह से सात साल हुए हैं। भाइयों के मम्मी-पापा भी साथ रहते हैं और सबसे खास बात दोनों की दादी का आशीर्वाद भी पूरे परिवार पर हैं, जो टिपीकल हिंदी फिल्मों की तरह बहुओं और बेटियों पर सवार रहती हैं और बेटों को मलाई खिलाने के लिए भागी फिरती हैं। मम्मी जरा कंजूस और पिता खुद को किसी रियासत के राजा समझते हैं और बादशाहों की तरह उड़ाते हैं।

सौणां परिवार मोतियां वरगा

कुनबा सारा मैं मैं मैं करदा

कॉमेडी ते इमोशन दा रोज लगदा तड़का

चॉक ले रबा, हुण नहीं जीन नू जी करदा

परिचय काफी है शायद...तो अब कहानी आगे बढ़ाते हैं। रिबन का डुप्लीकेट गॉगल लगाए बिना नॉक किए हम घुस गए घर में (खास यार जो है)।
'वे मार जानयां, कित्थे मुंह चकया ही।' दादी की आवाज सुनते हैं मैंने कांपते हुए कहा, 'मैं वां तेजेंद्र। किशनू दा यार।'
'किशनू ने तवानू सिर चाढय़ा होया हें दिन नहीं वेखदे रात नहीं सोचदे..आ जांदे ने तांग करन।'
इतने में दादी की आवाज सुनकर किशनू बाहर निकला और बोला, 'झाई, तेनु चैन नहीं आंदा। ऐ तेजू हे...। चुप कारके अंदर बैठी रहया कर।'
'आ यार, अंदर चल। तू बुरा न मनी। झाई दी ते आदत हैगी', किशनू ने मुझे समझाते हुए कहा।
कोई नहीं यार। बुजुर्ग हे, डोंट वरी। मैंने गॉगल सिर पर चढ़ाते हुए कहा।
गॉगल नू जेब एच पा लै या मेनू दे दे। मैं संभाल लांगा, किशनू ने गंभीरता से कहा।
मैंने इग्नोर करते हुए कहा 'छोड़ ना यार, महंगा गॉगल है तू गवा देगा।' उस समय मैं किशू का मंतव्य नहीं समझ सका था।
अंदर बेड पर बैठते ही डायरी और पेन निकालकर रख दिया। शादी शुदा परिवार का अनुभव जो जानना था। किशनू को आने का मंतव्य बताने से पहले मैंने पानी मांगा।
इतने में जाने कैसे किशनू के बेटे ने सिर पर से अचानक गॉगल उतार लिया और थोड़ी दूर भाग गया।
बेटा, ऐसा नहीं करते। चाचू का गॉगल वापस कर दो..., किशनू ने बेटे सीमू को पुचकारा।
इससे पहले कि किशू की पुकार सीमू सुनता, कड़ाक की आवाज आई और गॉगल कागज की तरह दो फाड़ हो गया।
गॉगल नहीं मेरा दिल तार-तार हो गया। शाम को ही गर्लफ्रेंड से मिलने जाना था। महीने के आखिरी दिनों में जेब काटकर रिबन का डुप्लीकेट गॉगल चार सौ रुपए में खरीदा था।
हाय मेरा गॉगल...अंदर ही अंदर मैं दहाड़ पड़ा।
पर कर भी क्या सकता था। किशनू ने पहले ही समझा दिया, तब तक तो देर हो चुकी थी।
खैर सोचा, दुनिया को शादीशुदा परिवार की कहानी बताने के लिए रिबन का गॉगल कुर्बान।
मैं अंदर ही अंदर रोते हुए बेड से उठकर कुर्सी पर बैठ गया। इतने में किशू के छोटे भाई रेलू की बेटी हाथ में गिलास लेकर आई।
'ताचू...ताचू...मम्मी ने कहा है ये पी लो।'
इससे पहले कि मैं पानी पीता, बेटी भारी गिलास संभाल नहीं पाई और पानी सीधे मेरी पेंट पर जा गिरा।
हे भगवान...। मालूम मैं क्यों चिल्लाया।
क्योंकि ये पानी नहीं सलाइस थी, जिसका दाग कम से कम बिना धुले उतरने वाला नहीं था।
मेरी प्यारी जींस।
इस जींस को सूखने में भी दो दिन लगने थे, मौसम जो ठंडा था।
हाय बिना गॉगल और प्यारी जींस के कैसे मिलूंगा गर्लफ्रेंड से।
कितनी मिन्नते करके उसे शाम को मिलने के लिए राजी किया था।
एक बार तो मन हुआ नहीं लेना कोई इंटरव्यू। पर फिर दिल पर पहाड़ रख लिया।
आते ही झाई की डांट खा चुका था, गॉगल तुड़वा लिया और जींस को धुलवा बैठा। फुटी किस्मत या किशनू की अच्छा दिन। जो उल्टा उसके साथ होता था उसके अपने घर में, आज वो मेरे साथ हो रहा था।

मैंने खुद को संभाला और किशनू को कहा, 'यार किन्नी रौनक हे तेरी घार विच। बच्चे एधर-उधर खेड्दे पए ने। बरझाइयां किचन विच कुज न कुज बना रहियां ने। तू यार बाहर बोर्ड क्यों नहीं लगा देंदा। सौ रुपए दी टिकट लओ ते ऐनी सौणी रौनक वेखन दा मौका पाओ', मैंने दार्शनिक अंदाज में कहा।
'तेजू तू मेरे कोलो सौ रुपए ले जा ते ऐ रौनका बाहर ले जा।'
इस बार मैं उसका भाव ताड़ गया और कुछ नहीं बोला।
खैर मैंने कहा, 'यार मैं तेरे कोल किसी खास काम नाल आया सी। मैं शादी शुदा परिवार ते कुज लिखना है। ऐ समझ ले, सारे नेता-डकैत-भ्रष्टाचारी-वेले छाड के मैं एक भरे पुरे परिवार दा इंटरव्यू लेना है। तू अपनी दादी, मम्मी, डैडी, बच्चे, भाई और बरझाई नू बुला लैं। मैं सारया नाल ओनादे अनुभव साझा करने नै।'
'यार, तू इंटरव्यू लेन आया हे या, साड्ढे घार ओबामा-ओसामा नू मिलवान आया हे। सारे कट्ठे बह गए ना ते ऐ दो मंजिले मकान नू ढहन लगे देर नहीं लगनी', किशनू ने गुस्से में कहा।
'यार तू चिंता क्यों करदा हे। सारया नू मैं संभाल लांगा। वड्ढा पत्रकार हेगा (थोड़ा जानबूझकर रौबा जमाया) सारी दुनिया नू वेखना वां। फेर तेरा परिवार की चीज हे', मैंने टूटे गॉगल पर प्रेमभरी नजरें डालते हुए कहा।
'तेरी वजह नाल शायद लोकां दा घार वास जाएं। कोई तेरे कोलो प्रेरणा लेके तेरे जैवा रौनकां वंडदा परिवार ही पा ले। सोच यार, सोच तेरे भाई दे लेख नाल कोई कमाल ही न हो जाए', मैंने फिर जोर मारा।
'वेख, मैंनू कुज नहीं पता। जे तू मेरे नाल कोशिश करे ते सारयां नू कट्ठा कर देना वां। पर बाकि इंटरव्यू लेन दी जिम्मेदारी तेरी।' किशनू ने सहमते हुए हामी भर तो दी पर मैं अब डर चुका था। फिर भी इंटरव्यू तो लेना ही था।
'पर मेरी इक गल पत्थर दी लकीर हैगी', किशनू ने कहा।
मैंने पूछा वो क्या।
भाप्पा-भाप्पा कहंदे सी (पापा-पापा कहते थे)

किने खुश रहंदे सी (कितने खुश रहते थे)

भाप्पा-भाप्पा कवाने हां (पापा-पापा कहलवाते हैं)

किने दुख पाने हां (कितने दुख पाते हैं)

किशनू के इस डॉयलॉग को मैंने हंसी में उड़ा दिया।
यार मैं जरा जींस बदलकर आना। तब तक तू सारया नू बुला।
जब तक मैं पेंट बदलकर आता हूं, तब तक आप भी इंटरव्यू का इंतजार करें।

Monday, August 2, 2010

सबकुछ प्री प्लांड है

देशभर में कॉमवेल्थ गेम्स को लेकर हल्ला मचा हुआ है। विपक्षी पार्टियां घोटालों का आरोप लगाते हुए दिल्ली बंद तक करने पर तुली हैं। इसके बावजूद हमारे आयोजन समिति के चौधरियों, ठेकेदारों, मालियों, तकनीशियनों और छोटी-छोटी फर्मों से लेकर सबसे बड़े चौधरी धनमाडी साहब के चेहरे पर कोई शिकन नहीं है। ऐसा होता है किसी भी महान कार्य को करने से पूर्व किसी महान व्यक्ति का कांफिडेंस। आइए आज हम आपको मिलवाते हैं इस वर्ष के सबसे फेमस चेहरे वन एंड ऑनली मिस्टर धनमाडी से।

धनमाडी जी सबसे पहला सवाल, आपने अपना नाम क्यों बदल लिया ?
एक्चुली क्या है कि मेरे ज्योतिषियों ने मुझे सुझाया कि कलमाडी नाम मेरे ग्रहों के लिए ठीक नहीं है। कलमाडी का मतलब है आने वाला कल माड़ा (खराब)। इसलिए मैंने माडी से पहले धन जोड़ लिया। जिसके साथ धन होगा उसका कल कैसे माड़ा हो सकता है जी।
आप पर विपक्षी पार्टियां भ्रष्टाचार का आरोप लगा रही है, आपका क्या कहना है ?
देखिए। मेरा मतलब सुनिए। हमारे देश में चारा घोटाला, स्टांप घोटाला और शेयर घोटाला हो चुका है। पब्लिक बोर हो गई है। उन्हें कुछ नया चाहिए कि नहीं। वैसे भी यह हमारा गेम प्लान है। जिसमें हम सक्सेस हो गए हैं।
इस प्लान से क्या फायदा हुआ ?
ये सीक्रेट है। ये आपको कॉमनवेल्थ के बाद बताएंगे।
खेल के स्टेडियम उद्घाटन के बाद ही टपकने लगे हैं। दिल्ली की सड़कें टूटी पड़ी हैं। इतने कम समय में क्या आयोजन के सक्सेस हो पाएगा ?
वेरी इंटेलिजेंट क्वेस्चन। ये भी हमारे गेम प्लान का ही हिस्सा था। हम चाहते हैं कि हमारे सभी खिलाड़ी केवल और केवल गोल्ड मेडल ही जीतें। दूसरे मुल्कों के खिलाड़ी शातिर होते हैं और मेडल जीत जाते हैं। इस बार हमने स्टेडियम अपने अनुकूल बनाए हैं। सभी पिचों पर खड्ढे हैं। पानी टपक रहा है। ऐसे हालात में विदेशी खिलाड़ी कंफ्यूज हो जाएंगे। पर हमारे खिलाड़ी ऐसे हालातों में खेलने के मास्टर हैं। अगर हमारे खिलाडिय़ों को चीकना मैदान दे दें तो पीछे ही रह जाते हैं। अब देखते हैं कैसे हमारे होनहार मेडल नहीं जीतते। हमने उनको हर आसान सुविधा दे दी है अब। जहां तक दिल्ली की सड़कों की बात है, विदेशी यहां एडवेंचर करने आ रहे हैं। रहने थोड़ा है उनको यहां। ऊंची नीची गड्ढम गड्ड सड़क पर जब चलेंगे तो उनको कितनी खुशी होगी, ये आप नहीं समझ सकते। ऐवरीथिंग इस प्लांड माय ब्वाय।
आप तो भारत रत्न मांग रहे हैं ?
क्यों न मांगे भारत रत्न। चीन ने बीजिंग ओलंपिक में अपना जलवा दिखाया। अब हमें भी कुछ अलग करके दिखाना था। मैंने अपना काम ईमानदारी से किया है। अब देखिए। सारी दुनिया आतंकवाद आतंकवाद चिल्ला रहे हैं। खेलों पर आतंकवादी खतरा मंडरा रहा था। आतंकवादी क्या चाहते हैं, खेल न हो। आज की डेट में जो हालात हैं, उसमें विश्व में मैसेज चला गया है कि इंडिया में कोई कॉमनवेल्थ गेम्स होंगे ही नहीं शायद। आतंकवादी भी चैन की सांस लेंगे और हम भी। बाद में हम चुपके से खेल करवा देंगे। भारत को मेरे जैसा हीरा कहीं मिलेगा कहीं। बताइए तो सही। मैं ही हूं असली खेल रत्न।
अय्यर साहब ने तो अपशकुन कर दिया। कह रहे हैं कि दुष्ट लोग खेल करवाते हैं ?
अय्यर साहब का अपशकुल भी एक सोचा समझा प्लान है। यू नो हम सब एक ही झुंड के बंदे हैं। पहले वो खेल मंत्रालय में थे। अब मैं हूं। सब कुछ ठीक हो जाएगा। यू विल सी।
टेंडर काफी महंगे दामों में जारी हुए ?
आप क्यों नहीं चाहते कि इंडिया कभी तरक्की करे। मैं चाहता हूं कि दुनिया देखे कि इंडिया कितना आत्मनिर्भर हो गया है। हमने करोड़ों रुपए में कुर्सियों, जेनरेटर और तंबूओं के टेंडर दिए हैं। इससे मैसेज जाता है कि वी आर हैप्पी पीपुल। विदेशियों को भी हमने टेंडर दिए हैं। सारा काम बिल्कुल योजनाबद्ध तरीके से चल रहा है।
सुना है कि इस पूरे खेल पर बॉलीवुड में फिल्म बनने जा रही है। आपको क्या लगता है कि आपका रोल किसे निभाना चाहिए ?
ये बॉलीवुड वाले भी ना बस। इनको तो कोई न कोई स्टोरी चाहिए। चलो बढिय़ा है। इससे तो हमारा नाम ही रोशन होगा। वैसे आपको नहीं लगता मैं फिजिकली और लुकिंग वाइज कितना अटरेक्टिव लगता हूं। ये रोल मुझे ही मिलना चाहिए। अगर मुझे रोल नहीं मिला तो कम से कम आमिर खान मेरी जगह लें। क्योंकि जिस तरह मैं अपना हर काम परफेक्ट करता हूं वैसे ही आमिर बंदा भी मेरे नेचर का है।
एक और आखिरी सवाल
सवाल जवाब बहुत हो गए। मेरी आज अमेरिकी राष्ट्रपति के सलाहकार से मीटिंग हैं। हम सोच रहे हैं कि अमेरिका को निमंत्रण दे दें ताकि इसी बहाने उन्हें हमारे मुल्क का हाल पता चले। और हमें भी वो पाकिस्तान की तरह डॉलर ही दे जाएं। देखा मेरी स्कीम...अगर सब कुछ ठीक ठाक होता तो क्या हम अमेरिका की जेब से कुछ निकलवा पाने की सोच सकते। अपनी सोच का दायरा बढ़ाओ दोस्त।
ओके बाय।
कॉमनवेल्थ गेम्स के बाद मिलेंगे।