खेड लै बस कल तक
मान्नी पप पप (आइसक्रीम का कप) बॊलती भागती
कुर्सी के नीचे छिप कर करती झां (हाइड एंड सिक)
नन्ही सी मुसकान और छॊटी छॊटी बाहॊं से बुलाती
शरारती कदमॊं से छनकाती पाजेब
भइयां देखॊ कितनी तेज बिटिया हमारी
पेन से खेले और कापियां करे रंगीन
निकलेगी बाहर, जितेगी दुनिया सारी।
चार दिनां दा हे बचपना
खेड लए बस कल तक
पढ लिखकर की करनगियां
कुडियां साड्डी नहीं जांदी स्कूल
तू वी ना सिर चढा
ना तू एनानूं पढा।
पप (आइसकीम) की जिद में निकले आंसू
रॊ मत मान्नी, सीख ले खवाहिशॊं कॊ दबाना
धियां नूं बॊझ ही मनया हे असीं आज तक
खेड लै तू बस कल तक।
खेड लै तू बस कल तक।।
165 मेरे काका लीलाधर वसाणी , पानसे काका , हंडियेकर सर , देशपांडे काका ,
नान्दूरकर काका
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90.6 देशपांडे और नान्दूरकर काका - बाबूजी के साथ देशपांडे काका और नान्दूरकर
काका उनके कलीग थे । देशपांडे काका की दो बेटियाँ थीं और नान्दूरकर काका के एक
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2 days ago

3 comments:
अच्छी कविता है। मनोभावों का सजीव चित्रण।
मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और सुंदर टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने!
मेरे अन्य ब्लोगों पर भी आपका स्वागत है!
... बढ़िया है |
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