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Saturday, August 12, 2017

सब्र जिसे कहते हैं, वो भावना चौक पर रहता है

न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन...। क्या खूब कह गए हैं जगजीत सिंह। क्या सब्राना फिलॉसफी है। मैं तो कहता हूं सरकार को एक डाबर जन्म घुट़टी के पैरलल एक सब्राना घुट़टी भी जनता के नाम जनता के लिए जनता के हित में जारी करनी चाहिए। होशाना उम्र से पहले ही बच्चा दुनियादारी समझ जाए। वैसे आपको बता दें कि ये सब्र के शाब्दिक पैमाने भावना चौक से होते हुए छलके हैं।  आइये, जरा भावना चौक पर टहल आते हैं और इस सब्र की घुट्टी को भी समझ लेते हैं। 
रास्ते में ही पड़ता है देवी मंदिर। मां दुर्गा का आशीर्वाद लेकर ही आगे बढ़ते हैं। सौ कदम ही आगे चले थे। वधावाराम कालोनी का सुरेंद्र अपने ऑटो रिक्शा को उल्टा किए खड़ा था। पत्रकार को क्या चाहिए। मुसीबत से तड़पता इंसान। लिखने को चार लाइनें। पास जाते ही पूछा, क्या बात, खराब हो गई क्या मशीन।
चेहरे पर लंबी मुस्कान लिए सुरेंद्र ने कहा- भाई साहब। लगता है चौक पर नए आए हो। मालूम नहीं क्या, हमें चलते ऑटो रिक्शा अच्छे नहीं लगते। ये डेढ़ का बीज खराब ही नहीं हो रहा था। इसलिए उल्टा टांग दिया है। मन को शांति मिल रही है। आगे कोई ऑटो को लैटाकर बैठा हो तो उससे ये सवाल मत पूछना। सड़क साफ सुथरी, बिना टूटी हुई हो तो हमसे रोटी नहीं खाई जाती, ऑटो कैसे चलाएंगे। 
भाई, बड़े सब्र वाले हो। मैंने सुरेंद्र से हाथ मिलाकर आगे की राह पकड़ी। एक रिपोर्ट खराब कर दी।
थोड़े कदमों पर एक ताई मिली। सिर पर गेहूं का कट्टा। आधे पैर कीचड़ से सने। 
भाई, मिल गया कसूत फोटो और मैटर। पत्रकार मन ने हिचकोले खाए।
क्या बात ताई, घणी परेशान हो री सै के। सरकार ने बिरान माट्टी कर दी के। 
के कहवे है बेट्टा। तनै काच्चे काटदे लोग आच्छे कौनी लागदे।
ताई, इसमें कौन से काच्चे काट्ट री सै। अपनी हालत देखी है।
रे छोरे, शहर में नया आया सै। फिर पिछला सवाल सामने आ गया।
यो कीचड़ कौनी, म्हारे अफसरों का प्यार सै। बैरा नहीं तनै। बाढ़ की प्रैक्टिस करान लाग रहया यो खट्टर। सरकार ने कत्ती बढिय़ा काम किया सै। यू चौक पर छह महीने से रोज नू ऐ आवैं और जावैं हैं। काल ने बाढ़ आ गी ते इसी प्रैक्टिस हो जाएगी, आराम ते निकढ़ जयांगे। गेहूं का कट्टा लेकर घरां से निकड़ी हूं। तेरे ताऊ से शर्त लागी है। वापस कट्टे ने साफ सुथरा ही लयाऊंगी। सौ रुपिये उसते भी कमा लऊंगी। ईब बता। सरकार ने याड़े कीचड़ न कर रखया होंदा तो के मैं सौ रुपिये कमा लेंदी। तू पत्तरकार भी घना भोला है।
मैं ताई को राम-राम करता आगे निकला।
लो जी, मैं पहुंच ही गया बरसत को जोडऩे वाले सबसे बड़े चौक पर। पानी में जंप लगाते हुए, उछल कूद करते हुए करते हुए चार बच्चे स्कूल जाते हुए दिखाई दिए। इससे पहले कोई छींट मेरे ऊपर पड़ती, मैंने डांटते हुए कहा- ये क्या तेवर हैं। यहां पत्रकार मेट कीचड़ फिल्म चल रही है क्या। जब हैरी मेट सेजल से वाक्य जोड़ा तो मुझे खुद ही आश्चर्य हुआ, क्या लाइन मारी है। 
क्या अंकल। हम तो आपका ही भला कर रहे थे।
इसमें क्या भला है। 
देखिए। हम रोज स्कूल जाते हैं। जमीं पूरे कीचड़, मिट्टी के साथ। इससे पहले हमारे चरण शिक्षा के मंदिर में पड़े, मैडम हमें छुट्टी का प्रसाद दे देती हैं। हम तो चाहते हैं सरकार ये रास्ता बनाए ही नहीं। फालतू में छुट्टियां खत्म हो जाएंगी। आप भी कीचड़ मलो और दफ्तर से होलिडे लेकर निकड़ पड़ो।
भाई आइडिया तो कसूत है। खैर बच्चों से छुटकारा पा मैं एक सरदारजी के पास पहुंचा।
भाजी, बड़ी मुश्किल च रह रहे हो। किद्दा गुजारा करदे हो ऐथे।
सरदारजी ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। जैसे मैंने कोई यूएफओ का सवाल पूछ लिया हो। 
मेनूं लागदा तू ऐथे नया आया है। तीसरी बार फिर वही सवाल सामने।
काके। असीं मां भारती, ऐस देश से सच्चे सेवक हैगे हां। मोदी ने कहया सी, चंगे देन आवन गे। सानूं पुरा विश्वास हेगा। चंगे देन आवनगे।
ओ ते नोटबंदी च दगा हो गया। काला पैसा सरकार कौल पोंचया कोनी। दसों, कित्थों सड़कां बननगियां। 
पनामा पपर्स तो उम्मीद जगी हे, जिवे पाकिसतानियां दा शरीफ बेनकाब होया है, ओवें ही साड्डे देश दे गद्दार वी फड़े जानगे।

फेर पैसा आऊगा तो ऐथे शीशें वांगु सड़क बनुगी। 
तू वी ऐथे छालां मार। सरकार नूं दिखा। असीं देश दे नाल वां।
तभी 
भारत माता की जय...करता एक कारवां वहां से गुजर गया।मैं भी समझ गया, सब्र जिसे कहते हैं, वो भावना चौक पर रहता है।