Thursday, August 16, 2018

युद्ध की धरा पर अटल पांव, बातें हाली की

कौरव कौन
कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है।
दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है।
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
जुए की लत है।
हर पंचायत में
पांचाली
अपमानित है।
बिना कृष्ण के
आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है।


युद्ध की धरा पर अटल पांव, बातें हाली की

पानीपत की धरा। सुल्तान पंरपरा को रौंदकर बादशाही हुकूमत की गवाह। लोधी की कब्र जो एक पार्क में सुशोभित है। मुगल का भी तो अंत ही हुआ। अयोध्या में बाबरी मस्जिद तो सारी दुनिया जानती है। पर पानीपत में भी एक बाबरी मस्जिद है। बाबर की बनाई मस्जिद। लाखों के लाख मराठे यहां अकाल मौत की नींद सो गए। उसी जमीं पर जब अटल के पांव पड़े तो उन्होंने कोई युद्ध गीत नहीं गाए। उन्होंने कोई रक्त की बात नहीं की। कवि ह्रदय ने युद्ध का संवाद छेड़ा भी तो जनता के लिए ही। जन जन के आंसुओं का हिसाब मांगा। अपनी कविता में भी तो उन्होंने कहा है, रंक को तो रोना है।
आइये आपको बताते हैं, अटलजी जब पानीपत में आए थे। या यूं कहें कि जब- जब पानीपत आए, तब-तब उन्होंने जिंदगी में आगे बढऩे का ही संदेश दिया। बात 70 के दशक की है। अटलजी पानीपत के एक जलसे में आए थे। तब के जनसंघ के बड़े नेता फतेहचंद विज ने उन्हें बुलाया था। आज उनके बेटे प्रमोद विज ने जिले में भाजपा की कमान संभाली हुई है।
तब अटलजी ने, खुले मंच से जंगों की बात नहीं, हाली की बात की थी।
बोले थे, चार डग हमने भरे तो क्या किया, है पड़ा मैदान कोसों का अभी।
जरा सोचिये, कितनी बड़ी बात कही। हाली के जरिये, कह गए। कितनी मंजिलें तो अभी बाकी हैं।
उन्हीं मंजिलों में एक थी पानीपत रिफाइनरी की कहानी। आज दुनियाभर में पानीपत से बना प्लास्टिक अगर मशहूर है तो रिफाइनरी और नेफ्था क्रेकर प्लांट की वजह से। आज हमारे विमान अगर उड़ान भरते हैं, तो उसकी वजह है पानीपत की रिफाइनरी। यहीं का रिफाइंड तेल विमानों में भरा जाता है।
तो ऐसे थे हमारे अटल।
तो क्या ये मान लिया जाए कि अटलजी केवल विकास की बात करते थे।
जवाब होगा, जी नहीं।
वो विकास से पहले इंसान बनना सिखाते थे।
हाली की ही एक कविता का उन्होंने जिक्र किया
बोले थे- फरिश्ते से बढ़ कर है इंसान बनना।
मगर इस में लगती है मेहनत ज्यादा।

आप सोच रहे होंगे अटलजी के बारे में इतनी बातें हो गईं, पर उनका एक खास शौक तो रह ही गया। वो शौक था खाने का। उन्होंने कभी इसे छिपाया नहीं।

ग्वालियर के बहादुरा के बूंदी के लड्डू हों या फिर दौलतगंज की मंगौड़ी। अटल जी के प्रिय व्यंजनों में से हैं. हर दुकान से उनकी यादें जुड़ी हुई हैं। बहादुरा के लड्डू उन्हें इसलिए भी पसंद थे क्योंकि वे ग्वालियर शहर के शिंदे की छावनी में जन्मे और वहीं पले-बढ़े। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अटल बिहारी वाजपेयी के मुंह से ग्वालियर के हलवाई के लड्डू, जलेबी और कचौड़ी का जायका नहीं गया। अटलजी को चायनीज, खिचड़ी, खीर और मालपुआ बहुत पसंद थे। वहीं दिल्ली में रहने के दौरान वे अक्सर पराठे वाली गली, सागर और चंगवा के यहां जाकर कुछ न कुछ जरूर खाते थे. मिठाई अटलजी के पकवानों की मेन्यू लिस्ट में हमेशा सर्वोपरि रही। भांग के अटलजी शौकीन रहे हैं। उनके लिए उज्जैन से भांग आती थी.

इन सबके के बीच, वो पानीपत की कचौडिय़ों के भी शौकीन थे। किले के पास चिमन हलवाई की कचौड़ी की उन्हें खबर लगी तो सीधे पहुंच गए थे वहां। अपने साथियों को भी खिलाई। तब एक जगह उन्होंने कहा था, पानीपत की कचौड़ी तो शानदार है।

तो ऐसे थे हमारे अटल।


Saturday, August 12, 2017

सब्र जिसे कहते हैं, वो भावना चौक पर रहता है

न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन...। क्या खूब कह गए हैं जगजीत सिंह। क्या सब्राना फिलॉसफी है। मैं तो कहता हूं सरकार को एक डाबर जन्म घुट़टी के पैरलल एक सब्राना घुट़टी भी जनता के नाम जनता के लिए जनता के हित में जारी करनी चाहिए। होशाना उम्र से पहले ही बच्चा दुनियादारी समझ जाए। वैसे आपको बता दें कि ये सब्र के शाब्दिक पैमाने भावना चौक से होते हुए छलके हैं।  आइये, जरा भावना चौक पर टहल आते हैं और इस सब्र की घुट्टी को भी समझ लेते हैं। 
रास्ते में ही पड़ता है देवी मंदिर। मां दुर्गा का आशीर्वाद लेकर ही आगे बढ़ते हैं। सौ कदम ही आगे चले थे। वधावाराम कालोनी का सुरेंद्र अपने ऑटो रिक्शा को उल्टा किए खड़ा था। पत्रकार को क्या चाहिए। मुसीबत से तड़पता इंसान। लिखने को चार लाइनें। पास जाते ही पूछा, क्या बात, खराब हो गई क्या मशीन।
चेहरे पर लंबी मुस्कान लिए सुरेंद्र ने कहा- भाई साहब। लगता है चौक पर नए आए हो। मालूम नहीं क्या, हमें चलते ऑटो रिक्शा अच्छे नहीं लगते। ये डेढ़ का बीज खराब ही नहीं हो रहा था। इसलिए उल्टा टांग दिया है। मन को शांति मिल रही है। आगे कोई ऑटो को लैटाकर बैठा हो तो उससे ये सवाल मत पूछना। सड़क साफ सुथरी, बिना टूटी हुई हो तो हमसे रोटी नहीं खाई जाती, ऑटो कैसे चलाएंगे। 
भाई, बड़े सब्र वाले हो। मैंने सुरेंद्र से हाथ मिलाकर आगे की राह पकड़ी। एक रिपोर्ट खराब कर दी।
थोड़े कदमों पर एक ताई मिली। सिर पर गेहूं का कट्टा। आधे पैर कीचड़ से सने। 
भाई, मिल गया कसूत फोटो और मैटर। पत्रकार मन ने हिचकोले खाए।
क्या बात ताई, घणी परेशान हो री सै के। सरकार ने बिरान माट्टी कर दी के। 
के कहवे है बेट्टा। तनै काच्चे काटदे लोग आच्छे कौनी लागदे।
ताई, इसमें कौन से काच्चे काट्ट री सै। अपनी हालत देखी है।
रे छोरे, शहर में नया आया सै। फिर पिछला सवाल सामने आ गया।
यो कीचड़ कौनी, म्हारे अफसरों का प्यार सै। बैरा नहीं तनै। बाढ़ की प्रैक्टिस करान लाग रहया यो खट्टर। सरकार ने कत्ती बढिय़ा काम किया सै। यू चौक पर छह महीने से रोज नू ऐ आवैं और जावैं हैं। काल ने बाढ़ आ गी ते इसी प्रैक्टिस हो जाएगी, आराम ते निकढ़ जयांगे। गेहूं का कट्टा लेकर घरां से निकड़ी हूं। तेरे ताऊ से शर्त लागी है। वापस कट्टे ने साफ सुथरा ही लयाऊंगी। सौ रुपिये उसते भी कमा लऊंगी। ईब बता। सरकार ने याड़े कीचड़ न कर रखया होंदा तो के मैं सौ रुपिये कमा लेंदी। तू पत्तरकार भी घना भोला है।
मैं ताई को राम-राम करता आगे निकला।
लो जी, मैं पहुंच ही गया बरसत को जोडऩे वाले सबसे बड़े चौक पर। पानी में जंप लगाते हुए, उछल कूद करते हुए करते हुए चार बच्चे स्कूल जाते हुए दिखाई दिए। इससे पहले कोई छींट मेरे ऊपर पड़ती, मैंने डांटते हुए कहा- ये क्या तेवर हैं। यहां पत्रकार मेट कीचड़ फिल्म चल रही है क्या। जब हैरी मेट सेजल से वाक्य जोड़ा तो मुझे खुद ही आश्चर्य हुआ, क्या लाइन मारी है। 
क्या अंकल। हम तो आपका ही भला कर रहे थे।
इसमें क्या भला है। 
देखिए। हम रोज स्कूल जाते हैं। जमीं पूरे कीचड़, मिट्टी के साथ। इससे पहले हमारे चरण शिक्षा के मंदिर में पड़े, मैडम हमें छुट्टी का प्रसाद दे देती हैं। हम तो चाहते हैं सरकार ये रास्ता बनाए ही नहीं। फालतू में छुट्टियां खत्म हो जाएंगी। आप भी कीचड़ मलो और दफ्तर से होलिडे लेकर निकड़ पड़ो।
भाई आइडिया तो कसूत है। खैर बच्चों से छुटकारा पा मैं एक सरदारजी के पास पहुंचा।
भाजी, बड़ी मुश्किल च रह रहे हो। किद्दा गुजारा करदे हो ऐथे।
सरदारजी ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। जैसे मैंने कोई यूएफओ का सवाल पूछ लिया हो। 
मेनूं लागदा तू ऐथे नया आया है। तीसरी बार फिर वही सवाल सामने।
काके। असीं मां भारती, ऐस देश से सच्चे सेवक हैगे हां। मोदी ने कहया सी, चंगे देन आवन गे। सानूं पुरा विश्वास हेगा। चंगे देन आवनगे।
ओ ते नोटबंदी च दगा हो गया। काला पैसा सरकार कौल पोंचया कोनी। दसों, कित्थों सड़कां बननगियां। 
पनामा पपर्स तो उम्मीद जगी हे, जिवे पाकिसतानियां दा शरीफ बेनकाब होया है, ओवें ही साड्डे देश दे गद्दार वी फड़े जानगे।

फेर पैसा आऊगा तो ऐथे शीशें वांगु सड़क बनुगी। 
तू वी ऐथे छालां मार। सरकार नूं दिखा। असीं देश दे नाल वां।
तभी 
भारत माता की जय...करता एक कारवां वहां से गुजर गया।मैं भी समझ गया, सब्र जिसे कहते हैं, वो भावना चौक पर रहता है।

Thursday, January 28, 2016

चर्चा में शनि

शनि मंदिर चर्चा में है। मुझे भी मेरी वो यात्रा याद आ गई। पहले इसे शेयर कर चुका हूं, सोचा एक बार फिर आपसे साझा करूं...।

मेरी
 यह पोस्ट शायद कुछ लोगों को नाराज कर सकती है। हो सकता है कि कुछ लानते-मलानतें भी भेजें। पर मैं खुद को रोक नहीं सका हूं। सोचा तो यह था कि पुणे से लौटते ही अच्छे-अच्छे संस्मरण लिखूंगा और ढेर सारी बातें शेयर करूंगा। पर वापस लौटते समय लिए गए एक निर्णय से काफी दुखी हूं।
बात 24 अक्टूबर की है। इसी दिन रात को मनमाड़ से दिल्ली तक मेरी ट्रेन थी। सोचा दिनभर खाली क्या करेंगे। शनि सिंगणापुर और शिरडी में घूम आते हैं (दर्शनों की बात तो बाद में ही सोचते हैं)। पिछले 14 दिनों की थकान को साइड में रखकर भारी बैग उठाए मैं अपने मेरठ के एक मित्र के साथ चलने को तैयार हो गया। बस और ऑटो से धक्के खाते हुए सबसे पहले शनिदेव के द्वारे पहुंचे। समझिए की शनिदेव की कृपा शुरू हो गई। ऑटो वाले ने शनिदेव मंदिर से दूर एक मैदान में छोड़ दिया। यहां हमारी तरह हजारों लोग आए हुए थे। हमें देखते ही एक दुकानदार दौड़ा आया और हमारा सामान अपनी दुकान में रखवा दिया। हम तो चाहते ही यही थे कि कहीं सामान रखने की जगह मिल जाए। फिर जाएंगे दर्शन करने। पर सामान रखवाने की कीमत मुझे चार सौ रुपए देकर चुकानी पड़ी। बदले में क्या मिला, दो-चार फोटो और दो सौ ग्राम सरसो का तेल। बंदे ने बताया कि ये तेल शनिदेव को चढ़ाना है। इससे वो खुश होते हैं।
मैंने पूछा दादा (यहां रहते-रहते हर किसी को दादा कहने की आदत हो गई), हम तो अपने शहर में तेल नहीं लेकर जाते। अगर लें भी जाएं तो एक कटोरी चढ़ा देते हैं। हम इतना तेल ले जाकर क्या करेंगे।
उसने हैरान होते हुए कहा, ये देखिए सरजी। लोग पांच-पांच लीटर तेल लेकर जा रहे हैं और आप दो सौ ग्राम तेल चढ़ाने में हिचक रहे हैं।
मैंने ज्यादा बहस नहीं की और स्नान करके रीति अनुसार धोती पहनकर चल दिया शनिदेव के द्वारे।
लंबी लाइन। चलते-चलते पैर थक गए। फर्श पर तेल ही तेल था। बुरी तरह टूट चुका था। वो तो अच्छा हुआ गिरा नहीं। सोच रहा था, पानीपत से क्या मैं यह तेल चढ़ाने यहां आया हूं। क्या कर रहा हूं मैं...।
आखिर में शनिशीला के नजदीक पहुंच ही गया। हजारों हजार लोग तेल चढ़ाने में जुटे हुए थे। हम सुबह ग्यारह बजे पहुंच गए थे वहां। सुबह से इतनी भीड़ थी तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि दिनभर में लाखों लीटर सरसों का तेल चढ़ जाता होगा। जिस देश में चालीस करोड़ जनता बीस रुपए रोजाना से कम पर गुजारा करती है, उस देश के देवता लाखों लीटर तेल पीकर संतुष्ट होते हैं। हैरानी ये कि महिलाएं कहीं नजर नहीं आ रही थीं। पता चला कि उन्हें अनुमति नहीं है। हमारे शहर में तो शनिवार को सुबह-सुबह मोहल्लों में आने वाले शनिदेव को तेल चढ़ाती हैं। मंदिरों में इन्हीं की भीड़ रहती है।
खैर, मूड खराब हो चुका था और मैंने आधे मन से शीला पर थोड़ा तेल चढ़ाया और पैकेट वहीं रखकर आगे निकल आया।
जाते-जाते तय कर लिया, दोबारा कम से कम तेल चढ़ाने तो नहीं आऊंगा।
बाहर आकर उसी दुकान पर कपड़े बदले और निकल चले शिरडी। सवारियों से भरी निजी गाड़ी में हम भी फेवीकोल की तरह चिपक कर बैठ गए। गाड़ी वाले ने बताया, एक घंटे तक पहुंच जाएंगे शिरडी। मगर हाय री किस्मत। थोड़ी दूर चलते ही दिखाई दिया कि आरटीओ का छापा था। गाड़ी वाले ने तुरंत स्टेयरिंग घुमाया और पहिए कच्चे रास्ते पर दौडऩे लगे। गाड़ी उछलती-कूदती कच्चे रास्ते पर दौड़ती हुई तीन घंटे बाद हमें शिरडी तक आखिर ले ही गई।
बीच में मन ही मन डॉयलॉग मार चुका था, उम्मीदों का चिराग जलाए रखना...। कभी तो रात होगी। 
खैर, शाम से पूर्व हम शिरडी पहुंच गए। यहां उतरते ही सिंगणापुर की तरह एक बंदा आया और हमारा सामान रखवाने की बात करने लगा। मगर इस बार हमने सामान दुकान पर नहीं बल्कि क्लॉक रूम में रखवाया। सात रुपए का टिकट कटवाया। वो बंदा हमें अपनी दुकान पर ले गया। यहां पर भी डेढ़ सौ रुपए की पर्ची कटवाई और प्रसाद का थैला लेकर हम चल दिए दर्शन करने।
जाहिर है तन टूट चुका था और मन भी आधा फूट चुका था। फिर भी अपने मित्र के साथ कदमताल करते हुए चलते रहे। मेरा मित्र काफी धार्मिक ह्रदय का बंदा है। शनि मंदिर में भी जय शनिदेव जय शनिदेव करते आंखें मूंदे हुए चलता रहा। यहां भी साईं भक्ति में कंपलीट डूबा हुआ था। मैं भी ईश्वर को मानता हूं, पर आवाज पता नहीं कहां गायब हो जाती है।
थोड़ी आगे पहुंचे ही थे कि अंदर जाने का रास्ता दिखाई दिया। इससे पहले कि अंदर जाते, सिक्योरिटी गार्ड ने रोक लिया।
भाई कहां जा रहे हो। यहां वीआईपी पास मिलते हैं। अगर आपको पास लेकर दर्शन करना है तो जाओ, नहीं तो आगे से दर्शन करो।
मैं चौक उठा। दादा ये क्या माजरा है।
भाई साहब, सौ रुपए देकर पास मिलता है। पास लोगे तो पंद्रह मिनट में नंबर आ जाएगा और नहीं लोगे तो डेढ़ घंटे में नंबर आएगा।
रोम-रोम तो कह रहा था कि सौ रुपए दो और दर्शन करके चलते बनो।
पर अगले ही पल यह ख्याल मन से निकल गया। शनि मंदिर से जो खट्टा अनुभव लेकर चला था, यहां भी दिल और टूट गया।
सौ रुपए देकर साई बाबा के दर्शन। क्यों? जिसके पास सौ रुपए नहीं है वो बेचारा लाइन में लगा रहे। तड़पता रहे दर्शनों को। वाह रे साई बाबा। यहां भी अमीरों की सुनवाई।
मन तो किया यहीं से वापस लौट जाऊं। पर नहीं कर सका। वही हुआ जो सिक्योरिटी गार्ड ने बताया था। बिना पास के लाइनों में लगे हुए भक्तों का नंबर डेढ़ घंटे में आया जबकि पास लेकर आए भक्त हमारे सामने से विशेष गेट खुलवाकर दर्शन करके चलते बने।

मेरे साथ ही कुछ बुजुर्ग भी चल रहे थे। मन में ख्याल आया कि अगर वीआईपी पास बनाना ही है तो इन बुजुर्गों का फ्री क्यों नहीं बनाते। ये भी किया जा सकता है जो युवा अपने माता-पिता को लेकर आएं, उनका पास फ्री बनाया जाएगा। कम से कम पास के ही बहाने बच्चे अपने माता-पिता को लेकर तो आ सकते हैं।
मरते-मरते किसी तरह दर्शन किए और बाहर निकले। मैं आगे चल रहा था अपने मित्र से बात करते हुए। बात करते-करते मैं तो आगे बढ़ गया, जब पीछे मुढ़कर देखा तो मित्र था ही नहीं। पीछे गया तो मित्र महोदय एक मंदिर में साष्टांग प्रणाम किए हुए लेटे हुए थे। मैं बाहर ही बैठ गया और मन ही मन प्रार्थना की कि मुझ दुष्ट का तो जो होगा सो होगा, पर मेरे मित्र को साई बाबा जरूर कामयाबी देना।
जाते-जाते यहां भी तय किया, दोबारा नहीं आऊंगा। कम से कम जब तक ये सौ रुपए के वीआईपी पास दर्शन खत्म नहीं होते।
मन इतना टूट चुका था कि तय किया कि घर जाकर प्रसाद भी नहीं बांटूंगा। क्यों बांटू प्रसाद। इसका मेरे अंतर्मन ने कोई जवाब नहीं दिया।

Thursday, November 12, 2015

दाल, धुआं, रामराज और लक्ष्मी जी

जयश्री जय श्रीराम। स्वर्ग लोक में खाकी निकर पहनकर टहलते हुए नारद जी लक्ष्मी को देखकर रुक गए। रॉलेक्स घड़ी की तरफ देखते हुए नारदजी चौके। घड़ि की सूइयां दीपावली के शुभ मुहूर्त की तरफ दौड़े चली जा रही थी। नारदजी हैरान इसलिए, क्योंकि माता लक्ष्मी थी कि अब तक तैयार ही नहीं हुई थीं धरतीवासियों (ऑनली विश्वगुरु भारत) के पास जाने के लिए।
माते, क्या हुआ। अब तक कुछ श्रृंगार नहीं। क्या इस बार हरी की धरा पर जाने का विचार नहीं।
क्या बताऊं नारदजी। तुम तो जानते हो, पिछली बार जब गई तब आधे रास्ते से ही लौटना पड़ा। विष्णु जी कितनी तकलीफ में आ गए थे। दवा-बूटी लाने में भागदौड़ करते रहे। हनुमानजी को धरती वासी छोड़ते नहीं। वे ही पहले ला दिया करते थे बूटियां। पिछली बार धरती पर एंट्री से पहले ही रॉकेट इधर से उधर निकल गए। पिछली बार तुम सोनिया के घर से इटेलियन पायल लाए थे, वो रॉकेट में उलझकर कहीं खो गई। माया का पर्स हाथ से छिटक गया था। धुएं से बचने के लिए किंग खान का दिया चश्मा पहना था, उसमें तो कुछ दिखा ही नहीं। फिल्मी चश्मे के कारण गिरते-गिरते बची। धमाके इतने के कान फट गए। इतने तीर तो रामजी ने भी रावण को मारने के लिए नहीं छोड़े होंगे, जितने धमाके वहां हो रहे हैं।
तो क्या हुआ माते, इस बार नजारा कुछ और ही है। इस बार मैं आपके लिए खाकी चुन्नी लाया हूं। ये साथ ले जाएं।
नहीं नारद। पिछली बार धुएं के कारण एलर्जी हो गई थी। छह महीने लगे ठीक होने में।
माते, इस बार सब व्यवस्था ओके है। सरकार देवी-देवताओं की आई है। सब भजन गा रहे हैं। देवताओं को याद कर रहे हैं। पहले कहां ऐसा होता था।
अच्छा जी, पर वो धुआं-धक्खड़। जाम का क्या होगा।
उसका ही तो इंतजाम हुआ है इस बार।
तो क्या, हमारी प्रिय अवतरन धरतीनगरी जागरूक हो गई है।
ये ही समझ लो माते।
और नारद तुम तो अभी वहीं से लौटे  हो। चेहरा भी चमक रहा है। खांस नहीं रहे। और ये खाकी ड्रेस क्यों पहनी है। तंबूरे की जगह लाठी क्यों पकड़े हो।
माते, यही तो बता रहूं। रामराज आ गया है, रामराज।
सब भगवान का नाम जप रहे हैं।
तुम गोलमोल बातें बहुत करते हो। पहले तो ठीक पत्रकार थे, जब से धरती से लौटे हो, वहां के मसखरे पत्रकारों की तरह हो गए हो। सही बताओ।
माते, राम का नाम लेने वालों की सरकार आई है। वैसे तो कोई राम नाप जपता नहीं। इसका हल निकालते हुए महंगाई पर कंट्रोल बंद कर दिया। बेचारे दाल तक के लिए तरस गए। रोते हुए राम का ही नाम लेंगे न। ऐसे रामराज्य की स्थापना भी हो रही है। कोई अल्लाह-अल्लाह का राग छेड़े तो चूं-चपड़ करने वाले को तंबूरे की जगह ये लठ्‌ठ समझाने के लिए काफी है।
पर पुत्र, वो धुएं का क्या हल निकाला।
क्या माते, आप भी कितनी भोली हैं। तभी तो बैकुंठधीश आपसे दूर होने के लिए कोई न कोई बहाना ढूंढते रहते हैं। कोई न कोई कथा गढ़ ही लेते हैं।
नारदजी, क्या आप सच कह रहे हैं, स्वामी ऐसा करते हैं।
माते, आप पृथ्वीं पर जाइए, उनको बाद में छेड़ना।
रामराज्य के आइडिये में ही धुएं का हल छिपा है माते। दाल नहीं खरीद पाते तो रॉकेट, पटाखे कहां से लाएंगे।  प्रदूषण नहीं होगा तो नगरी साफ ही रहेगी न। माल-मत्ता जेब में नहीं होगा तो काहे बाहर घूमने को जाएंगे। तो, जाम की भी आपको फिक्र नहीं।
क्या, पुत्र। हर जगह इतनी शांति। फिर तो जाना बनता ही है।
पुत्र, रामराज्य की वजह से ही तुम जयश्री राम जयश्रीराम बोल रहे हो। नारायण को छोड़ दिया।
वाह माते, आप तो बहुत जल्दी समझ गईं इस बार। रामराज में जाना है तो राम-राम तो कहना ही पड़ेगा।
अरे, स्वामीजी सुनते हो। इस शेषनाग को त्यागाे और मेरे साथ इस बार आप भी चलिए।
सबसे पहले दसजनपथ चलते हैं।
रुको माता, एड्रेस अपडेट करो। 7 रेसकोर्स, पंचवटी जाना है इस बार। वहीं पर मेरा तंबूरा पड़ा है। उसको लेते आना। लौटते हुए नागपुर से कुछ खाकी कपड़े लेते आना। गलती से एक ही ड्रेस लेकर आया हूं। इसे पहनकर जाने पर इज्जत बढ़ जाती है।

Tuesday, March 11, 2014

इन नेताओं से तो फिल्मी लड़कियां ही अच्छी हैं, बोल्ड, ब्यूटीफुल, समझदार...


देश में होने वाले चुनाव इस समय सबसे बड़ा टॉकिंग इश्यू बने हुए हैं। बड़े से बड़े विश्लेषक (गलतफहमियां हो जाती हैं, इंसान ही तो हैं) से लेकर आम आदमी के कमेंट्स से फेसबुक, ट्विटर जैसी साइट्स और इधर-उधर होने वाली चौपालें भरी रहती हैं।
नेताओं से इतर, मुझे एक बात सुनने को मिली, जो यहां शेयर कर रहा हूं। है पॉलिटिक्स से जुड़ी ही। मैं और मेरी क्वीन  (शिल्पा) कुछ दिनों पहली देखी फिल्मों पर चर्चा कर रहे थे। हर फिल्म में एक कॉमन बात थी, पहले की फिल्मों में हीरो ही हीरो छाए रहते थे, लड़कियों की अहमियत ही नहीं होती थी। पर अब जैसे लगता है ये साहसी अभिनेत्रियां इन्हें पीछे छोड़कर अपना मुकाम बना रही हैं। दीपिका को देखिए- ये जवानी, दीवानी में रणबीर को बैकफुट पर कर दिया तो राम-लीला में रणवीर कहां टिकते हैं। हाईवे में मंझे हुए हुड्डा के सामने आलिया भट्ट शेरनी की तरह छा गई...। परिणीति की हंसी तो फंसी देख लीजिए- हर तरफ वही है। आशिकी फेम श्रद्धा कपूर की आंखों को देखकर लगता है कि कहीं से वे नई अदाकारा है। हर भाव उनकी आंखों से झलकता है। अगर वो न भी बोलतीं तो भी चल जाता।
तनु वेड्स मनु वाली कंगना अब क्वीन में क्वीन साबित हो रही हैं।
समझदार समीक्षकों, सिर्फ मनोरंजन ढूंढने वाले दर्शकों की परिभाषा पर भले ही इन अभिनेत्रियों की कुछ फिल्में खरी न उतरें, पर कुछ न कुछ बदलाव देखने को मिल रहा है। आप याद कीजिए, कब आप बुढ़ाते अभिनेताओं को ध्यान में रखकर फिल्म देखने गए थे और कब आप इन साहसी अभिनेत्रियों को देखने गए थे। शायद आंकलन आसान हो जाए या फिल्म देखने के बाद सोचा हो।
खैर, अब जरा मुख्य बात की तरफ लौटूं।  बातों के बीच बात निकली- क्यों न इन नेताओं की जगह फिल्म की लड़कियों को मौका दें देश चलाने का।  बोल्ड हैं, ब्यूटीफुल और समझदार है। लड़कों के छक्के छुड़ा रही है। बात-बात पर झगडऩे, कुर्सियां उठाने वाले नेताओं से तो अच्छा ही देश चलाएंगी...।
सुन/पढ़ रही हो लड़कियों...चीयर्स

Thursday, July 18, 2013

चिंता मेरी या हम सबकी

चिंता मेरी या हम सबकी

 
बात तो बहुत छोटी सी है, लेकिन मुझे बड़ी प्रतीत हो ही थी। सो, आपके साथ साझा कर रहा हूं। मेरी सवा साल की गुडिय़ा है, जबकि एक परिचित की गुडिय़ा साल की है। कुछ दिन पहले परिचित हमारे घर अपनी गुडिय़ा के साथ आए। उनकी गुडिय़ा पोएम, 'ऊपर पंखा चलता है, नीचे गुडिय़ा सोती है...' पर अच्छे हाव-भाव बना रही थी। मम्मी-पापा जो कहते, उसे फॉलो कर रही थी। जबकि हमारी गुडिय़ा, जो उससे थोड़ी बड़ी है, उसकी अपना ही नटखटपन है। जैसे- उसे बाय करने को कहो तो डांटते हुए स्वर में हू कहती है, ताकि कोई उसे छोड़कर न जाए। यानी, जब मन हुआ हाथ हिलाकर बाय कहना और जब मन न हुआ तब डांट देना। पानी को अभी मम कहकर नहीं बुलाती। बस रोने लग जाती है। सारा दिन सिर्फ खेलने की तरफ और चीजें उठाकर इधर-उधर रखने का शौक। आप सोच रहे होंगे कि इसमें समस्या क्या है।
समस्या यह है कि गुडिय़ा की मम्मी और परिवार वालों को यह चिंता सता रही है कि हमारी गुडिय़ा हमारे कहे अनुसार हाव-भाव क्यों नहीं बनाती। सबके सामने मम्मी को मम्मी, पापा को पापा क्यों नहीं कहती। पोएम पर कुछ करती क्यों नहीं।
मैं उन्हें समझाता हूं, अरे भई- नन्ही सी जान है बेचारी। सवा साल के बच्चे को क्या अपने इशारों पर नचाओगे। उसके भोलेपन, मासूमियत और बालमन को इन्जवॉय करो। लेकिन मेरी इस बात को कोई सुनता ही नहीं। कभी-कभी तो मैं भी उनकी बातों से चिंतित हो जाता हूं। फिर जब मैं कहता हूं कि इसे तो चार साल बाद स्कूल में डालेंगे। बचपन जी लेने दो इसे। मेरी इस बात पर तो मानों तूफान खड़ा हो जाता है। सवा दो साल में स्कूल डालने की बात शुरू हो जाती है।
अब बताइए, क्या किया जाए...।

Sunday, July 31, 2011

शादी का लड्डू

शादी के लड्डू का स्वाद कैसा होता।
यह महज एक सवाल न होकर भारी-भरकम अध्ययन का विषय बन चुका है। चुटकुलों से लेकर गंभीर साहित्य तक में पन्ने काले हो चुके हैं, की-बोर्ड खटखटाए जा चुके हैं और यह सदक्रम जारी है। कुंवारे (पहले मैं भी) इस तरह की चर्चाओं को बड़े स्वाद लेकर सुनते हैं तो शादीशुदा (शहीद) मसाले लगाकर अनुभव सुनाते हैं। चूंकि मैं भी अब दूसरी कैटेगरी में शामिल हो गया हूं तो सोचा क्यों न पिछले डेढ़ महीने में लड्डू का स्वाद कैसा था, उसे अपने इस मोहल्ले में ही शेयर कर लूं। इसी बहाने कुछ कुंवारों को स्वाद लेने का मौका मिल जाएगा तो कुछ शहीद अपने अनुभव भी बांट लेंगे।
बात शुरू करता हूं आखिर से। क्योंकि यहीं से तो इस पोस्ट का बीज पड़ा था।
विवाह के ठीक एक महीने बाद 20 जुलाई को शिल्पा (मेरी बे-गम) ने मुझे मुरझाया हुआ गुलाब (सॉरी शिल्पा, इसमें तुम्हारा क्या कसूर। तुमने तो सुबह ही गुलाब ले लिया था और मुझे रात को दिया।) थमाते हुए हैप्पी मंथली वेडिंग डे विश किया।
मेरे देर से आने की वजह से गुलाब का फूल मुरझा गया था, सो मैडम नाराज तो थी। लेकिन कहां कुछ नहीं (थैंक्यू, पर ये मेरी भूल थी)
तो जी, थोड़ी देर खामोशी के बाद मुझ पर एक सवाल दागा- जब आपकी मेरे साथ सगाई हुई थी, तब आपको कैसा फील हुआ था।
अब बताओ जरा, इसका क्या जवाब हो सकता है। फिर भी मैंने गंभीर मुद्रा में इस सवाल का जवाब देने के लिए सगाई के दिन को याद करने के लिए अपने दिमाग की कैसेट को छह महीने पीछे ले गया। कोई डिप्लोमेटिक जवाब नहीं मिला तो कह दिया अच्छा लगा था।
मुझे उम्मीद नहीं थी, मेरे छोटा सा जवाब बखेड़ा भी खड़ा कर देगा।
बस अच्छा लगा था, और कुछ नहीं। आपको और कुछ फील नहीं हुआ। आपने कुछ महसूस नहीं किया। मुझे तो लगा था कि आप कोई अच्छा सा जवाब देकर मुझे खुश कर देंगे। मंथली वेडिंग डे का सारा मूड खराब कर दिया, शिल्पा के खतरनाक तेवर देखकर एक बार तो मैं सहम ही गया।
अरे मैडम, इसमें नाराज होने की क्या बात है। अच्छा लगा था का मतलब है कि बहुत अच्छा लगा था। मैं अपनी भावनाओं को शब्दों में बता नहीं सकता, मैंने जब साहित्यिक अंदाज में मामले को संभालने की कोशिश की तो उल्टा जवाब मिला कि अब बहाने मत बनाओ। मुझे पता चल गया है कि आप मुझसे कितना प्यार करते हो।
अरे यार, इसमें यह प्यार का पैमाना कहां से आ गया, मैंने थोड़ा रुखे मन से कहा।
बस फिर क्या था, तब तो बात और बिगड़ गई।
आ गए ना सच पर। चेहरे पर दिखा दिया ना सच। आपको तो कुछ भी महसूस नहीं हुआ था।
ओफ्फो। अच्छा बाबा। ये लो। ऐ बन्ने अस्सी हाथ। चरणां नू टेकया मथा। तुसी ही दसो, तवानों की फील होया सी, मैंने वही सवाल शिल्पा की तरफ उछाल दिया।
बताऊं...। चलो हटो। मैं नहीं बताती, शर्माते हुए जिस अदा से उसने यह कहा तो जी कर रहा था कि वीडियो शूट कर लूं।
अब बताओ भी, मुझसे तो इतना झगड़ रही थी। अब क्या हुआ, मैंने रौब से कहा।
अच्छा तो फिर सुनो, मैंने तो उसी दिन अपनी मम्मी को कह दिया था कि अब मैं किसी की हो गई। जब आप गए थे ना तब वो थ्री इडियट्स फिल्म का गाना आया था, जुबी-डुबी। उसमें ऐसा लग रहा था कि आप मेरे आमिर (वैसे आपकी हाइट उससे ज्यादा है, फिर भी चलेगा) और मैं करीना (मेरी हाइट तो उसके बराबर है, इसलिए मुझे पक्का चलेगा) । मैं तो बस आपके ख्यालों में ही डूब गई थी। मुझे पता नहीं क्या हो गया था। दो दिन तक तो मैं ढंग से खाना भी नहीं खा सकी........किटटिककिटटिककिटटिक......।
बीस मिनट के बिना सांस रोके और पानी पिए लंबे-चौड़े फिलिंग ज्ञान के बीच में टोकते हुए मैंने सहमे-सहमे हिम्मत की और कहा कि बाबू ऐसा ही तो फील किया था मैंने।
बस रहने दो। अब जब मैंने बताया तब आपको याद आ गया। मैं आपको अच्छे से जान गई हूं। बड़े चालू हो आप...। जाओ मुझे आपसे कोई बात नहीं करनी।
इस पूरे एपिसोड के कारण मैं जो कुल्फी लेकर आया था, वो गर्मी के कारण पिघल चुकी थी। मैंने जब कहा कि कुल्फी खा लेते हैं तो यहां भी गड़बड़ हो गई। कुल्फी पिघलने का दोष मेरे सर हो गया, क्योंकि मैंने उसी समय इसे खाने का सुझाव नहीं दिया जब मैं इसे लेकर आया था। खैर मुझे अपनी फेवरीट तीले वाले कुल्फी चमच्च से खानी पड़ी।
इस बीच, फिर एक पंगा ले लिया।
यार, शिल्पा तुम भी ना। अब शादी हो चुकी है और तुम सगाई के दिनों को लेकर बैठी हो। चलो कुछ और बात करते हैं, मैंने उस पुराने टापिक को बदलने की कोशिश की।
अच्छा ठीक है, आप ये बताओ.....।
(ना-ना, ये एपिसोड अगली पोस्ट में)

कृप्या इस पोस्ट को कोई अन्यथा ना ले। मैं तो यूं ही लिख रहा हूं। एपिसोड जारी रहेंगे। शिल्पा भी लिख रही है, तो उसका भी ब्लॉग बन जाएगा तो वो भी वहां कहानियां डाल देगी, जिससे हिसाब बराबर हो जाएगा। अगर नहीं डालेगी तो मैं उसकी कहानियां यहां पोस्ट कर दूंगा।

सबक : क्रोधित पत्नी और जलते-जलते बीच में बुझे बम को कभी छेडऩा नहीं चाहिए, क्योंकि किसी भी समय धमाका हो सकता है। इसलिए पानी डालकर इन्हें शांत करें।

पत्नी गंभीर मुद्रा में कोई भी सवाल पूछे तो उसे हल्के में ना लें। मेरे जैसा ढीला जवाब ना दें।
गलती अगर आपकी है तो सॉरी जरूर बोले और अगर नहीं है फिर तो जरूर सॉरी बोलें।