Friday, September 24, 2010

भाप्पा-भाप्पा कहंदे सी किने,. खुश रहंदे सी

कॉमनवेल्थ, अयोध्या अध्याय और बाढ़ के बीच पता नहीं क्यों इन दिनों हर जगह मुझे मिया-बीबी के किस्से बहुत पढऩे को मिल रहे हैं। इतने दिनों से ब्लॉग नहीं लिखा। सोचा छूटे पंछी (बैचलर ) की तरह इधर उधर के ब्लॉग पर ही विचरण कर लूं। तो यहां भी रश्मि जी और वंदना जी के लेख पढऩे को मिल गए, जो पारिवारिक रिश्तों और उलझनों पर विचार सांझा कर रहे थे। मनोरंजक चैनल वाले हर जगह जोडिय़ां बनाने और जोडिय़ा तोडऩे पर तुले हुए हैं। हमारे घर पर भी बस यही चर्चा छिड़ी रहती है (समझिए कि रोज बचते फिरते हैं या बचने का नाटक करते हैं) । एक दिन मेरी सिस्टर ने बेगम और शौहर के बीच का फर्क पूछ लिया। जवाब मिला, बेगम वो जिसे कोई गम न हो और शौहर वो, जिसकी विवाह के बाद शौ हर ली गई हो। ...चलो जाने दो, बात लंबी क्यों बढ़ाएं। हमने सोचा क्यों न आपको आपको एक छोटी सी फैमिली से मिलवा दें। मैंने अपनी कलम और डायरी उठाई और पहुंच गए अपने मित्र के घर शादी शुदा जीवन के अनुभव जानने...।

इस फैमिली में दो भाई हैं, दोनों शादीशुदा। दोनों के दो-दो बच्चे। खुदा की रहमत से दोनों के पास एक-एक लड़का और एक-एक लड़की है। बच्चों की उम्र पांच साल से ऊपर नहीं हैं। यानी कुर्बान हुए अभी छह से सात साल हुए हैं। भाइयों के मम्मी-पापा भी साथ रहते हैं और सबसे खास बात दोनों की दादी का आशीर्वाद भी पूरे परिवार पर हैं, जो टिपीकल हिंदी फिल्मों की तरह बहुओं और बेटियों पर सवार रहती हैं और बेटों को मलाई खिलाने के लिए भागी फिरती हैं। मम्मी जरा कंजूस और पिता खुद को किसी रियासत के राजा समझते हैं और बादशाहों की तरह उड़ाते हैं।

सौणां परिवार मोतियां वरगा

कुनबा सारा मैं मैं मैं करदा

कॉमेडी ते इमोशन दा रोज लगदा तड़का

चॉक ले रबा, हुण नहीं जीन नू जी करदा

परिचय काफी है शायद...तो अब कहानी आगे बढ़ाते हैं। रिबन का डुप्लीकेट गॉगल लगाए बिना नॉक किए हम घुस गए घर में (खास यार जो है)।
'वे मार जानयां, कित्थे मुंह चकया ही।' दादी की आवाज सुनते हैं मैंने कांपते हुए कहा, 'मैं वां तेजेंद्र। किशनू दा यार।'
'किशनू ने तवानू सिर चाढय़ा होया हें दिन नहीं वेखदे रात नहीं सोचदे..आ जांदे ने तांग करन।'
इतने में दादी की आवाज सुनकर किशनू बाहर निकला और बोला, 'झाई, तेनु चैन नहीं आंदा। ऐ तेजू हे...। चुप कारके अंदर बैठी रहया कर।'
'आ यार, अंदर चल। तू बुरा न मनी। झाई दी ते आदत हैगी', किशनू ने मुझे समझाते हुए कहा।
कोई नहीं यार। बुजुर्ग हे, डोंट वरी। मैंने गॉगल सिर पर चढ़ाते हुए कहा।
गॉगल नू जेब एच पा लै या मेनू दे दे। मैं संभाल लांगा, किशनू ने गंभीरता से कहा।
मैंने इग्नोर करते हुए कहा 'छोड़ ना यार, महंगा गॉगल है तू गवा देगा।' उस समय मैं किशू का मंतव्य नहीं समझ सका था।
अंदर बेड पर बैठते ही डायरी और पेन निकालकर रख दिया। शादी शुदा परिवार का अनुभव जो जानना था। किशनू को आने का मंतव्य बताने से पहले मैंने पानी मांगा।
इतने में जाने कैसे किशनू के बेटे ने सिर पर से अचानक गॉगल उतार लिया और थोड़ी दूर भाग गया।
बेटा, ऐसा नहीं करते। चाचू का गॉगल वापस कर दो..., किशनू ने बेटे सीमू को पुचकारा।
इससे पहले कि किशू की पुकार सीमू सुनता, कड़ाक की आवाज आई और गॉगल कागज की तरह दो फाड़ हो गया।
गॉगल नहीं मेरा दिल तार-तार हो गया। शाम को ही गर्लफ्रेंड से मिलने जाना था। महीने के आखिरी दिनों में जेब काटकर रिबन का डुप्लीकेट गॉगल चार सौ रुपए में खरीदा था।
हाय मेरा गॉगल...अंदर ही अंदर मैं दहाड़ पड़ा।
पर कर भी क्या सकता था। किशनू ने पहले ही समझा दिया, तब तक तो देर हो चुकी थी।
खैर सोचा, दुनिया को शादीशुदा परिवार की कहानी बताने के लिए रिबन का गॉगल कुर्बान।
मैं अंदर ही अंदर रोते हुए बेड से उठकर कुर्सी पर बैठ गया। इतने में किशू के छोटे भाई रेलू की बेटी हाथ में गिलास लेकर आई।
'ताचू...ताचू...मम्मी ने कहा है ये पी लो।'
इससे पहले कि मैं पानी पीता, बेटी भारी गिलास संभाल नहीं पाई और पानी सीधे मेरी पेंट पर जा गिरा।
हे भगवान...। मालूम मैं क्यों चिल्लाया।
क्योंकि ये पानी नहीं सलाइस थी, जिसका दाग कम से कम बिना धुले उतरने वाला नहीं था।
मेरी प्यारी जींस।
इस जींस को सूखने में भी दो दिन लगने थे, मौसम जो ठंडा था।
हाय बिना गॉगल और प्यारी जींस के कैसे मिलूंगा गर्लफ्रेंड से।
कितनी मिन्नते करके उसे शाम को मिलने के लिए राजी किया था।
एक बार तो मन हुआ नहीं लेना कोई इंटरव्यू। पर फिर दिल पर पहाड़ रख लिया।
आते ही झाई की डांट खा चुका था, गॉगल तुड़वा लिया और जींस को धुलवा बैठा। फुटी किस्मत या किशनू की अच्छा दिन। जो उल्टा उसके साथ होता था उसके अपने घर में, आज वो मेरे साथ हो रहा था।

मैंने खुद को संभाला और किशनू को कहा, 'यार किन्नी रौनक हे तेरी घार विच। बच्चे एधर-उधर खेड्दे पए ने। बरझाइयां किचन विच कुज न कुज बना रहियां ने। तू यार बाहर बोर्ड क्यों नहीं लगा देंदा। सौ रुपए दी टिकट लओ ते ऐनी सौणी रौनक वेखन दा मौका पाओ', मैंने दार्शनिक अंदाज में कहा।
'तेजू तू मेरे कोलो सौ रुपए ले जा ते ऐ रौनका बाहर ले जा।'
इस बार मैं उसका भाव ताड़ गया और कुछ नहीं बोला।
खैर मैंने कहा, 'यार मैं तेरे कोल किसी खास काम नाल आया सी। मैं शादी शुदा परिवार ते कुज लिखना है। ऐ समझ ले, सारे नेता-डकैत-भ्रष्टाचारी-वेले छाड के मैं एक भरे पुरे परिवार दा इंटरव्यू लेना है। तू अपनी दादी, मम्मी, डैडी, बच्चे, भाई और बरझाई नू बुला लैं। मैं सारया नाल ओनादे अनुभव साझा करने नै।'
'यार, तू इंटरव्यू लेन आया हे या, साड्ढे घार ओबामा-ओसामा नू मिलवान आया हे। सारे कट्ठे बह गए ना ते ऐ दो मंजिले मकान नू ढहन लगे देर नहीं लगनी', किशनू ने गुस्से में कहा।
'यार तू चिंता क्यों करदा हे। सारया नू मैं संभाल लांगा। वड्ढा पत्रकार हेगा (थोड़ा जानबूझकर रौबा जमाया) सारी दुनिया नू वेखना वां। फेर तेरा परिवार की चीज हे', मैंने टूटे गॉगल पर प्रेमभरी नजरें डालते हुए कहा।
'तेरी वजह नाल शायद लोकां दा घार वास जाएं। कोई तेरे कोलो प्रेरणा लेके तेरे जैवा रौनकां वंडदा परिवार ही पा ले। सोच यार, सोच तेरे भाई दे लेख नाल कोई कमाल ही न हो जाए', मैंने फिर जोर मारा।
'वेख, मैंनू कुज नहीं पता। जे तू मेरे नाल कोशिश करे ते सारयां नू कट्ठा कर देना वां। पर बाकि इंटरव्यू लेन दी जिम्मेदारी तेरी।' किशनू ने सहमते हुए हामी भर तो दी पर मैं अब डर चुका था। फिर भी इंटरव्यू तो लेना ही था।
'पर मेरी इक गल पत्थर दी लकीर हैगी', किशनू ने कहा।
मैंने पूछा वो क्या।
भाप्पा-भाप्पा कहंदे सी (पापा-पापा कहते थे)

किने खुश रहंदे सी (कितने खुश रहते थे)

भाप्पा-भाप्पा कवाने हां (पापा-पापा कहलवाते हैं)

किने दुख पाने हां (कितने दुख पाते हैं)

किशनू के इस डॉयलॉग को मैंने हंसी में उड़ा दिया।
यार मैं जरा जींस बदलकर आना। तब तक तू सारया नू बुला।
जब तक मैं पेंट बदलकर आता हूं, तब तक आप भी इंटरव्यू का इंतजार करें।

6 comments:

ओशो रजनीश said...

बढ़िया प्रस्तुति .......

यहाँ भी आये और अपनी बात कहे :-
क्यों बाँट रहे है ये छोटे शब्द समाज को ...?

Mrs. Asha Joglekar said...

अब के इन्टरवू लेणा तुसी शादी शुदा परिवार का ट्रेलर तो देख ही लिया ।

Babli said...

पहले तो मैं आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हूँ मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और टिपण्णी देने के लिए!
बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने शानदार लिखा है जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

शरद कोकास said...

मज़ा आ गया ।

योगेन्द्र मौदगिल said...

thoda lamba ho gaya...fir bhi badhai...

rashmi ravija said...

वाह क्या बात है..मजा आ गया पढ़कर...बहुत दिनों बाद इस भाषा में बातचीत पढने को मिली...और दादी के डायलॉग तो बस कमाल के थे.