Sunday, July 31, 2011

शादी का लड्डू

शादी के लड्डू का स्वाद कैसा होता।
यह महज एक सवाल न होकर भारी-भरकम अध्ययन का विषय बन चुका है। चुटकुलों से लेकर गंभीर साहित्य तक में पन्ने काले हो चुके हैं, की-बोर्ड खटखटाए जा चुके हैं और यह सदक्रम जारी है। कुंवारे (पहले मैं भी) इस तरह की चर्चाओं को बड़े स्वाद लेकर सुनते हैं तो शादीशुदा (शहीद) मसाले लगाकर अनुभव सुनाते हैं। चूंकि मैं भी अब दूसरी कैटेगरी में शामिल हो गया हूं तो सोचा क्यों न पिछले डेढ़ महीने में लड्डू का स्वाद कैसा था, उसे अपने इस मोहल्ले में ही शेयर कर लूं। इसी बहाने कुछ कुंवारों को स्वाद लेने का मौका मिल जाएगा तो कुछ शहीद अपने अनुभव भी बांट लेंगे।
बात शुरू करता हूं आखिर से। क्योंकि यहीं से तो इस पोस्ट का बीज पड़ा था।
विवाह के ठीक एक महीने बाद 20 जुलाई को शिल्पा (मेरी बे-गम) ने मुझे मुरझाया हुआ गुलाब (सॉरी शिल्पा, इसमें तुम्हारा क्या कसूर। तुमने तो सुबह ही गुलाब ले लिया था और मुझे रात को दिया।) थमाते हुए हैप्पी मंथली वेडिंग डे विश किया।
मेरे देर से आने की वजह से गुलाब का फूल मुरझा गया था, सो मैडम नाराज तो थी। लेकिन कहां कुछ नहीं (थैंक्यू, पर ये मेरी भूल थी)
तो जी, थोड़ी देर खामोशी के बाद मुझ पर एक सवाल दागा- जब आपकी मेरे साथ सगाई हुई थी, तब आपको कैसा फील हुआ था।
अब बताओ जरा, इसका क्या जवाब हो सकता है। फिर भी मैंने गंभीर मुद्रा में इस सवाल का जवाब देने के लिए सगाई के दिन को याद करने के लिए अपने दिमाग की कैसेट को छह महीने पीछे ले गया। कोई डिप्लोमेटिक जवाब नहीं मिला तो कह दिया अच्छा लगा था।
मुझे उम्मीद नहीं थी, मेरे छोटा सा जवाब बखेड़ा भी खड़ा कर देगा।
बस अच्छा लगा था, और कुछ नहीं। आपको और कुछ फील नहीं हुआ। आपने कुछ महसूस नहीं किया। मुझे तो लगा था कि आप कोई अच्छा सा जवाब देकर मुझे खुश कर देंगे। मंथली वेडिंग डे का सारा मूड खराब कर दिया, शिल्पा के खतरनाक तेवर देखकर एक बार तो मैं सहम ही गया।
अरे मैडम, इसमें नाराज होने की क्या बात है। अच्छा लगा था का मतलब है कि बहुत अच्छा लगा था। मैं अपनी भावनाओं को शब्दों में बता नहीं सकता, मैंने जब साहित्यिक अंदाज में मामले को संभालने की कोशिश की तो उल्टा जवाब मिला कि अब बहाने मत बनाओ। मुझे पता चल गया है कि आप मुझसे कितना प्यार करते हो।
अरे यार, इसमें यह प्यार का पैमाना कहां से आ गया, मैंने थोड़ा रुखे मन से कहा।
बस फिर क्या था, तब तो बात और बिगड़ गई।
आ गए ना सच पर। चेहरे पर दिखा दिया ना सच। आपको तो कुछ भी महसूस नहीं हुआ था।
ओफ्फो। अच्छा बाबा। ये लो। ऐ बन्ने अस्सी हाथ। चरणां नू टेकया मथा। तुसी ही दसो, तवानों की फील होया सी, मैंने वही सवाल शिल्पा की तरफ उछाल दिया।
बताऊं...। चलो हटो। मैं नहीं बताती, शर्माते हुए जिस अदा से उसने यह कहा तो जी कर रहा था कि वीडियो शूट कर लूं।
अब बताओ भी, मुझसे तो इतना झगड़ रही थी। अब क्या हुआ, मैंने रौब से कहा।
अच्छा तो फिर सुनो, मैंने तो उसी दिन अपनी मम्मी को कह दिया था कि अब मैं किसी की हो गई। जब आप गए थे ना तब वो थ्री इडियट्स फिल्म का गाना आया था, जुबी-डुबी। उसमें ऐसा लग रहा था कि आप मेरे आमिर (वैसे आपकी हाइट उससे ज्यादा है, फिर भी चलेगा) और मैं करीना (मेरी हाइट तो उसके बराबर है, इसलिए मुझे पक्का चलेगा) । मैं तो बस आपके ख्यालों में ही डूब गई थी। मुझे पता नहीं क्या हो गया था। दो दिन तक तो मैं ढंग से खाना भी नहीं खा सकी........किटटिककिटटिककिटटिक......।
बीस मिनट के बिना सांस रोके और पानी पिए लंबे-चौड़े फिलिंग ज्ञान के बीच में टोकते हुए मैंने सहमे-सहमे हिम्मत की और कहा कि बाबू ऐसा ही तो फील किया था मैंने।
बस रहने दो। अब जब मैंने बताया तब आपको याद आ गया। मैं आपको अच्छे से जान गई हूं। बड़े चालू हो आप...। जाओ मुझे आपसे कोई बात नहीं करनी।
इस पूरे एपिसोड के कारण मैं जो कुल्फी लेकर आया था, वो गर्मी के कारण पिघल चुकी थी। मैंने जब कहा कि कुल्फी खा लेते हैं तो यहां भी गड़बड़ हो गई। कुल्फी पिघलने का दोष मेरे सर हो गया, क्योंकि मैंने उसी समय इसे खाने का सुझाव नहीं दिया जब मैं इसे लेकर आया था। खैर मुझे अपनी फेवरीट तीले वाले कुल्फी चमच्च से खानी पड़ी।
इस बीच, फिर एक पंगा ले लिया।
यार, शिल्पा तुम भी ना। अब शादी हो चुकी है और तुम सगाई के दिनों को लेकर बैठी हो। चलो कुछ और बात करते हैं, मैंने उस पुराने टापिक को बदलने की कोशिश की।
अच्छा ठीक है, आप ये बताओ.....।
(ना-ना, ये एपिसोड अगली पोस्ट में)

कृप्या इस पोस्ट को कोई अन्यथा ना ले। मैं तो यूं ही लिख रहा हूं। एपिसोड जारी रहेंगे। शिल्पा भी लिख रही है, तो उसका भी ब्लॉग बन जाएगा तो वो भी वहां कहानियां डाल देगी, जिससे हिसाब बराबर हो जाएगा। अगर नहीं डालेगी तो मैं उसकी कहानियां यहां पोस्ट कर दूंगा।

सबक : क्रोधित पत्नी और जलते-जलते बीच में बुझे बम को कभी छेडऩा नहीं चाहिए, क्योंकि किसी भी समय धमाका हो सकता है। इसलिए पानी डालकर इन्हें शांत करें।

पत्नी गंभीर मुद्रा में कोई भी सवाल पूछे तो उसे हल्के में ना लें। मेरे जैसा ढीला जवाब ना दें।
गलती अगर आपकी है तो सॉरी जरूर बोले और अगर नहीं है फिर तो जरूर सॉरी बोलें।

9 comments:

rashmi ravija said...

हा हा रवि...तो शादी के लड्डू को इतना आसान समझ लिया था...:)
इसीलिए तो कहते हैं...Men r frm Mars n women r frm Venus

और शायद इसीलिए रोचकता बनी रहती है....अब तुम दोनों ही अपनी -अपनी कहने लगते तो सुनता कौन..:)...इंतज़ार है....ऐसी ही ढेर सारी पोस्ट्स का...सबको अपने-अपने दिन याद आ जाएंगे

Udan Tashtari said...

गलती अगर आपकी है तो सॉरी जरूर बोले और अगर नहीं है फिर तो जरूर सॉरी बोलें।


--हिसाब बराबरी वाली पोस्ट का इन्तजार है उस तरफ से!! :)

सागर नाहर said...

मुरझाया गुलाब!
शिल्पाजी ने यह पोस्ट पढ़ी है? अगर पढ़ ली तो फिर...
आप अभी से बहाने सोचना शुरु कर दीजिए।
:)

Babli said...

आपकी उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया! आप शायद काम में व्यस्त थे इसलिए मेरे ब्लॉग पर आ नहीं पाए उसके लिए सॉरी कहने की ज़रुरत नहीं !
बहुत दिनों के बाद आपके ब्लॉग पर आकर बड़ा अच्छा लगा! बहुत ख़ूबसूरत पोस्ट !

Babli said...

आपको एवं आपके परिवार को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

सतीश सक्सेना said...

जन्माष्टमी की शुभकामनायें स्वीकार करें !

manoj thakur said...

प्रिय रवि सुुंदर लिखा। इसे पढ़ कर तो मुझे निकाह फिल्म की याद आ गई। छोटी छोटी बात ही बड़ी बनती है। इसलिए शुरू में ही मामला संभाल लेना चाहिए। कोशिश करनी चाहिए कि इस तरह की दिक्कत ही न आए। खैर वाक्या अच्छा लगा। यूं ही लड़ते झगड़ते खुश रहो। बस यहीं कामना है।

आशा जोगळेकर said...

तो ऐसी बीती शादी की मासिक वर्षगांठ । पर नाटक नही किया वही अच्छा है क्यूं कि कभी ना कभी तो पकडे जाते और वो धमाका होता ...........।

नई नई शादी की मुबारकें ।

सतीश सक्सेना said...

ना खाए तो अच्छा है ....
शुभकामनायें आपको !