Thursday, November 12, 2015

दाल, धुआं, रामराज और लक्ष्मी जी

जयश्री जय श्रीराम। स्वर्ग लोक में खाकी निकर पहनकर टहलते हुए नारद जी लक्ष्मी को देखकर रुक गए। रॉलेक्स घड़ी की तरफ देखते हुए नारदजी चौके। घड़ि की सूइयां दीपावली के शुभ मुहूर्त की तरफ दौड़े चली जा रही थी। नारदजी हैरान इसलिए, क्योंकि माता लक्ष्मी थी कि अब तक तैयार ही नहीं हुई थीं धरतीवासियों (ऑनली विश्वगुरु भारत) के पास जाने के लिए।
माते, क्या हुआ। अब तक कुछ श्रृंगार नहीं। क्या इस बार हरी की धरा पर जाने का विचार नहीं।
क्या बताऊं नारदजी। तुम तो जानते हो, पिछली बार जब गई तब आधे रास्ते से ही लौटना पड़ा। विष्णु जी कितनी तकलीफ में आ गए थे। दवा-बूटी लाने में भागदौड़ करते रहे। हनुमानजी को धरती वासी छोड़ते नहीं। वे ही पहले ला दिया करते थे बूटियां। पिछली बार धरती पर एंट्री से पहले ही रॉकेट इधर से उधर निकल गए। पिछली बार तुम सोनिया के घर से इटेलियन पायल लाए थे, वो रॉकेट में उलझकर कहीं खो गई। माया का पर्स हाथ से छिटक गया था। धुएं से बचने के लिए किंग खान का दिया चश्मा पहना था, उसमें तो कुछ दिखा ही नहीं। फिल्मी चश्मे के कारण गिरते-गिरते बची। धमाके इतने के कान फट गए। इतने तीर तो रामजी ने भी रावण को मारने के लिए नहीं छोड़े होंगे, जितने धमाके वहां हो रहे हैं।
तो क्या हुआ माते, इस बार नजारा कुछ और ही है। इस बार मैं आपके लिए खाकी चुन्नी लाया हूं। ये साथ ले जाएं।
नहीं नारद। पिछली बार धुएं के कारण एलर्जी हो गई थी। छह महीने लगे ठीक होने में।
माते, इस बार सब व्यवस्था ओके है। सरकार देवी-देवताओं की आई है। सब भजन गा रहे हैं। देवताओं को याद कर रहे हैं। पहले कहां ऐसा होता था।
अच्छा जी, पर वो धुआं-धक्खड़। जाम का क्या होगा।
उसका ही तो इंतजाम हुआ है इस बार।
तो क्या, हमारी प्रिय अवतरन धरतीनगरी जागरूक हो गई है।
ये ही समझ लो माते।
और नारद तुम तो अभी वहीं से लौटे  हो। चेहरा भी चमक रहा है। खांस नहीं रहे। और ये खाकी ड्रेस क्यों पहनी है। तंबूरे की जगह लाठी क्यों पकड़े हो।
माते, यही तो बता रहूं। रामराज आ गया है, रामराज।
सब भगवान का नाम जप रहे हैं।
तुम गोलमोल बातें बहुत करते हो। पहले तो ठीक पत्रकार थे, जब से धरती से लौटे हो, वहां के मसखरे पत्रकारों की तरह हो गए हो। सही बताओ।
माते, राम का नाम लेने वालों की सरकार आई है। वैसे तो कोई राम नाप जपता नहीं। इसका हल निकालते हुए महंगाई पर कंट्रोल बंद कर दिया। बेचारे दाल तक के लिए तरस गए। रोते हुए राम का ही नाम लेंगे न। ऐसे रामराज्य की स्थापना भी हो रही है। कोई अल्लाह-अल्लाह का राग छेड़े तो चूं-चपड़ करने वाले को तंबूरे की जगह ये लठ्‌ठ समझाने के लिए काफी है।
पर पुत्र, वो धुएं का क्या हल निकाला।
क्या माते, आप भी कितनी भोली हैं। तभी तो बैकुंठधीश आपसे दूर होने के लिए कोई न कोई बहाना ढूंढते रहते हैं। कोई न कोई कथा गढ़ ही लेते हैं।
नारदजी, क्या आप सच कह रहे हैं, स्वामी ऐसा करते हैं।
माते, आप पृथ्वीं पर जाइए, उनको बाद में छेड़ना।
रामराज्य के आइडिये में ही धुएं का हल छिपा है माते। दाल नहीं खरीद पाते तो रॉकेट, पटाखे कहां से लाएंगे।  प्रदूषण नहीं होगा तो नगरी साफ ही रहेगी न। माल-मत्ता जेब में नहीं होगा तो काहे बाहर घूमने को जाएंगे। तो, जाम की भी आपको फिक्र नहीं।
क्या, पुत्र। हर जगह इतनी शांति। फिर तो जाना बनता ही है।
पुत्र, रामराज्य की वजह से ही तुम जयश्री राम जयश्रीराम बोल रहे हो। नारायण को छोड़ दिया।
वाह माते, आप तो बहुत जल्दी समझ गईं इस बार। रामराज में जाना है तो राम-राम तो कहना ही पड़ेगा।
अरे, स्वामीजी सुनते हो। इस शेषनाग को त्यागाे और मेरे साथ इस बार आप भी चलिए।
सबसे पहले दसजनपथ चलते हैं।
रुको माता, एड्रेस अपडेट करो। 7 रेसकोर्स, पंचवटी जाना है इस बार। वहीं पर मेरा तंबूरा पड़ा है। उसको लेते आना। लौटते हुए नागपुर से कुछ खाकी कपड़े लेते आना। गलती से एक ही ड्रेस लेकर आया हूं। इसे पहनकर जाने पर इज्जत बढ़ जाती है।

1 comment:

santosh kumar said...

बहुत जबरदस्त ।